Thursday, October 22, 2009

2000 वर्ष से भी पुराना है यह क्षेत्र( वीरभद्र, ऋषिकेश ) त्रिमुखीमहादेव मंदिर



हरिद्वार से ऋषिकेश के मध्य वीरभद्र क्षेत्र अत्यंत ऐतिहासिक महत्व का है।ऎसे ही महत्वपूर्ण स्थल पर त्रिमुखीमहादेव  एंव प्रसिद्व वीरभद्र मंदिर स्थित है।


वीरभद्र क्षेत्र का इतिहास: ज्ञात हो कि वीरभद्र का इतिहास दो हजार साल से भी पुराना है। 1973-75 में एनसी घोष ने यहां पुरातात्विक खुदाई की थी उसमें कुषाणकाल के मृत्युपात्र,ईटें,कुषाण सिक्के व पशुओं की जली हुई अस्थि यों के अवशेष प्राप्त हुयें थे ।यह भी ज्ञात हुआ था कि यहां 100ई. के मध्य मानव सभ्यता संस्कृति सतत विघमान थी ।यह चित्र है त्रिमुखीमहादेव  मंदिर, का जो आज से लगभग 12 साल पुराना है क्योकि उस समय जैसा वीरभद्र क्षेत्र आज है वैसा नही था आज सीमाडेन्टल कालेज है, कई आश्रम है, टिहरी विस्थापितों की पुननिर्वासित  बस्ती है कहने का तात्पर्य 2000सालों के उपरान्त यह बस्ती फिर बसी है। गुप्तकाल में यह प्रसिद्व शैवर्तीथ भी था और यह क्रम 800 ई.अर्थात उत्तर गुप्तकाल तक सतत् चलता रहा था।जिस समय चीनी यात्री हृवेनसांग मो-यू-लो भोर गिरी का भ्रमण कर रहा था उस समय यहां भी बौद्व हिन्दू धर्म अनुयायियों के मठ मंदिर युक्त एक महानगर था।





त्रिमुखीमहादेव मंदिर :इस मंदिर की पौराणकिता  वीरभद्रेश्व महादेव मंदिर से जुडी है जब हरिद्वार स्थित कनखलमें दक्ष प्रजापति के यज्ञ कुण्ड में शिव पत्नी सती ने स्वंय को भस्म कर लिया तो शिव कुपित हो उठे उन्हें शांत करने के लिये देवताओं ने शिव के स्थान से थोडी दूरी पर उन्हें प्रसन्न करने के लिए गहन स्तुति की  इस पर शिव प्रसन्न व शांत हुये ,वह सौम्य  रूप में आ गये और  अपने त्रयम्बकेशवर रूप में अर्थात तीन मुखों से तीन देवताओं ब्रहृमा,विष्णु, इन्द्र को आर्शीवाद दिया । तत्पशचात  कनखल जाकर देवताओं को पुर्नजीवित किया तथा यज्ञ संपूर्ण कराया ।त्रिमुखीमहादेव मंदिर वह स्थान है जहां ब्रह्मा,विष्णुव इन्द्र को भगवान शिव के त्रिम्भकेशवर रूप का प्रतीक शिला त्रिमुखालिंग इस मंदिर की मुख्य विशेषता है।भगवान शिव का लिंग प्रतिमा रूप में निष्कल लिंग एंव   मुखालिंग दोनो ही प्रचलित है।गढवाल में प्रचलित शिव की लिंग प्रतिमा रूप में सर्वाधिक  निष्कल लिंगों का ही प्रचलन है ओर अधिकांश मंदिरों में यही रूप दिखायी पडता है।


मुखालिगों में शिव लिंग विग्रह  और पुरूष-विग्रह का समन्वय है । इसी कारण इन्हें मिश्र श्रेणी में रखा गया है । एस.राजन अपनी पुस्तक इंडियन टेम्पुल स्टाइल में लिखते है कि,"सर्वप्रथम ज्ञात लिंग मुखालिंग प्रकार के है। एक मुख  वा पंचमुखालिंग लिंगों की प्रप्ति मंदिरों में हई  है किंतु मुखालिंग प्रतिमा यहां पर दुर्लभ व अदभुत है,जो मुखालिंग उत्तराखण्ड के मंदिरों में प्राप्त होते है।
                                                                                                                      
 मुखालिंग भगवान शिव के सौम्य रूप के घोतक है ।जो कि ब्रह्मा,विष्णु और इन्द्र को एक साथ वरदान देने का प्रतीक है । सुंदर शिलामुखालिंग गुप्तकालीन है ।शिव के शांत  मुख पर सती का विरह भी देखा जा सकता है।वास्तुकला की दृष्टि से इसका निर्माण पहली या दूसरी शताब्दी का माना गया है ।चूंकि  शिवलिंग के मुखालिगों में चर्तुमुखालिंगों,एकमुखालिंग एंव पंचमुखालिंग लिंगों के र्दशन भारत के अन्य मंदिरों के गर्भगृहों में मिलते है ।त्रिमुखालिंग इसको वास्तव में बिल्कुल अनोखा एंव जिज्ञासु बनाता है ओझा                                                                                                  
निबन्ध संग्रह भाग एक पृष्ठमें कहा गया है।कि "यह मुर्तियां अनन्त ब्रमाण्ड रूप  शिवलिंग की थाह लेने के लिए ब्रहृमा विष्णु का नीचे की ओर जाना सुचित करती है ।" डा0 यशवंत घटोच ने इसे शैव-सम्प्रदाय की उच्चता का  सूचक कहा है ।

प्राचीन समय से ही यह स्थल सिद्वों की तपस्थली रहा है गुप्तकाल में प्रमुख शैवर्तीथ होने के कारण बडे-बडे सिद्व पुरूष यहां भगवान शिव की अराधना व तप किया करते थे। इस स्थान पर कई बार दैवीय अनुभूति होने की बात सुनने में आती है । बहुत पहले यह भी सुनने मे आता था कि एक नाग भी यहां  र्दशन करने आता था । जो सभ्यता व संस्कृति लुप्त हो गयी थी सिर्फ मंदिर ही शेष था व खेतों में प्राचीन अवशेष व छोटे-छोटे मंदिर इस स्थान पर मिलते थे नवनिर्माण के समय इनका सही रूप में संरक्षण नही हुआ न जाने कितनी ही दुलर्भ पुरातात्विक महत्व की चीजें नष्ट हो गयी केवल कुछ हिस्सा ही पुरातत्व विभाग ने संरक्षित किया है । कितने दुख की बात है एक तरफ तो माल कल्चर हम अपना रहे है, अपनी रोजमर्रा  की जरूरतों के लिए कितना ही धन अपव्यय कर देते है ।दुसरी तरफ इस ओर ध्यान जाता ही नही है ।वास्तव में ऐतिहासिक धरोहरो की उपेक्षा एक अतुलनीय हानि है । इन अमूल्य प्राचीन सभ्यताओं की वास्तुकला के नमुने व संस्कुति को दर्शाने वाले ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है ।






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Monday, October 5, 2009

क्या सचमुच गंगा की सुध आ गयी.......







जब से मैने "गंगा नदी ही नही संस्कृति भी "आलेख लिखा  मै यह सोच रही थी किसने पढा होगा क्या किसी के पास र्फुसत है मेरी मां गंगा के बारे में सोचने की लोगो को उनके लाइफस्टाइल,रिश्तों के बारे में ही सोचने से र्फुसत नही उन्हे क्या पडी कि इस देवतुल्य नदी के बारे में सोचे उन्हे सिर्फ अपने पाप ही तो धोने है या अस्थियां ही तो प्रवाहित करने के लिए गंगा की याद आयेगी मै यु आम लोगो की बात नही कर रही हुं क्योकि उनकी आस्था तो पूर्णतया गंगा से जुडी है लेकिन वो इतने समर्थ नही जो इस बारे में कुछ कर सके मै कर रही हुं उन लोगों कि जो समर्थ है पर कुछ करेगे नही क्योकि उन्हे क्या जरूरत है?गंगा की दुर्दशा से सभी परिचित है लेकिन आज सुबह जब अखबारों पर निगाह गयी तो कुछ उम्मीद की किरणे नजर आई।आप को भी पता होगा फिर भी एक नजर इन खबरों पर डालिए-




















काश ये सारे प्रयास हकीकत में सकार हो जाये और सिसकती गंगा को खिल कर प्रवाहित होने का मौका मिल जाये । गंगा को मां कहने वाले लाडलों को यह जानना भी जरूरी है जब भगीरथ अपने कठोर तप से इस र्स्वगीय नदी को पृथ्वी पर ले आये तो आज भगीरथ प्रयास में कमी न आये।ये प्रयास सिर्फ मेलों को ध्यान में ही रख कर के न हो वरन हमेंशा के लिए गंगा को साफ व प्रदुषण मुक्त किया जाये...........

Wednesday, September 30, 2009

गंगा नदी ही नही एक अद्भभुत संस्कृति भी....... अन्तिम भाग.. (वर्तमान परिवेश में गंगा)




गंगा नदी ही नही संस्कुति भी....अन्तिम भाग.........
मैने अपनी पुरानी पोस्टों में ज्रिक किया था कि गंगा नदी से  मूर्तिकार व चित्रकार सभी प्रभावित रहे है, तो यहां पर यह बताना और भी जरूरी हो जाता है कि हमारे समाज के मनोरंजन का सबसे सशक्त व असरदायक माध्यम सिनेमा को भी गंगा नदी ने आकर्षित किया चाहे फिल्मों की पटकथा की मांग हो या फिर गंगा के उपर बनी फिल्में व गाने ही क्यूं न हो कितनी ही किताबें ,लेख, आडियों विडियों एलबमें ,चित्रकथायें, ड्राक्युमेंट्री इत्यादि गंगा नदी पर बन चुकी है।गंगा के बारे में अभी तक उसकी ऎतिहासिकता एंव पौराणिकता व नदी किनारें पल्लवित हुई संस्कुति के बारे काफी कुछ बता चुकी हूं।  अब आगे....अगर पौराणिकता एंव  धार्मिकता की दृष्टि से हटकर गंगा को एक नदी के रूप में देखे तो संसार के लम्बे जलमार्गों में सें एक गंगा नदी का नाम भी आता है ,यही पहली ऎसी नदी है जिसकी जलधारा को नौकाआ द्वारा भारवहन के लिए तथा आवागमन के प्रमुख साधन के लिए प्रयोग किया जाता है ।नदी में मछलियां तथा सर्पो की अनेक प्रजातियां पायी जाती है, यह कृषि ,पर्यटन ,साहसिक  खेलों के लिए एंव उघोगों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दंती है ।वैज्ञानिक  मानते है कि इस के नदी के जल में बैक्टीरियों फेज नामक विषाणु होते है जो जीवाणु व विषाणु को जीवित नही रहने देता।
इसकी मिटट्री.घाटी उपजाउ एंव घनी आबादी वाली हैं कलकत्ता,हावडा,पटना,इलाहाबाद एंव कानपुर जैसे बडे व औघौगिक नगर इसके किनारे बसे है।कलकत्ता तक पहुंचते -पंहुचते  गंगा इतनी प्रदुषित हो  जाती है कि उसकी वैभवता व पवित्रता मात्र काल्पनिक लगने लगती है किनारे बसे तीर्थो ,नगरों में धार्मिक ,सामाजिक,सांस्कृतिक व पर्यावरण का प्रदुषित प्रकोप आज की कटु वास्तवकिता है वे र्तीथ जिनको देखने मात्र से  ही मनुष्यों कों मोक्ष प्राप्त होता था उनकी पावनता संदेहास्पद हो चुकी है।


ऎसी -ऎसी परियोजनायें चलाई जा रही है कभी बिजली उत्पादन के नाम पर कभी विकास के नाम पर, गंगा के अविरल प्रवाह को बांध दिया गया जिसका विरोध सन्त समाज शुरू से ही करता रहा है पर सरकार को इससे क्या ?परियोजनाओ के नाम पर राजनीति ही की जाती है। प्रतिदिन टनों की मात्रा में घरेलू व प्रदुषित सामग्री से गंगा के पवित्र जल को निरन्तर प्रदुषित किया जा रहा है जबकि विगत कई वर्षो से चलायी जा रही सफाई परियोजनायें व अभियान उतने ठोस व प्रभावशाली नही हो पाये जितने होने चाहिये थे।अंतर्राष्टीय बर्फ कमीशन का अनुमान है कि आने वाले चालीस सालों में सारे ग्लेशियर सिकुड जायेगे,गंगोत्री ग्लेशियर भी धीरं-धीरे सिकुड रहा है..............।
गंगा को सिर्फ स्वर्गिक नदी मान कर पूजा करने के व स्नान करने के अलावा यह सोचने की आवश्यकता है कि गंगा ने जो हमें समृद्वशाली संस्कृति ,सभ्यता ,उपजाऊ घाटी ,वन-सम्पदा ,मैदान ,जल-सस्थान ,विघुत -विकास की सम्भावनायें दी है उनका संरक्षण कितना आवश्यक है । तेजी से बढता प्रदुषण इस सबको विनाश की और ले जायेगा और क्या हम अपनी सभ्यता संस्कृति को यूं ही नष्ट होते देखते रहेगे ?क्या हिमालय की सुध लेने की आवश्यकता नही है ?इस वैज्ञानिक ,भौतिकतावादी युग में  अपनी जलवायु प्रकुति को देखते हुए विकास का माडल चुनने की आवश्यकता है न की किसी की नकल की ।
बहराल तेजी से बदलते भागते इस युग में जहां सभ्यता व संस्कृति जैसे शब्द अपने मायने खो रहे है वहां सदियों से गंगा के प्रति जों श्रद्वा व भक्ति हमारे पूवजों ने हमें सिखाइ है उसका सार इसी में है हम इसकी पवित्रता व वैभवता को बचायें रखने के लिए प्रयत्नशील हो आज से ही........कही ऎसा न हो कि बस हम यह गीत ही गाते रह जाये कि "गंगा में स्नान करेगे अपनी मुक्ति के लिए "......और आने वाली पीढी को उसकी कहांनियां ही सुनाते रह जाये..........।  


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(चित्र गुगल व टि्प एडवाइसर से साभार)

Monday, September 28, 2009

गंगा नदी ही नही एक अद्भभुत संस्कृति भी--भाग-3







गंगा नदी ही नही अद्वभुत संस्कृति भी ..भाग -2 से आगे........
हिमालय से लेकर गंगासागर  के सफर में इसके किनारे बसे नगरों एंव संस्कृति की शुरूवात तो गंगोत्री से ही हो जाती है 6माह शीतकाल में गंगोत्री में भले कोई न जाता हो पर ग्रीष्मकाल शुरू होते ही गंगोत्री में लोगो जमावडा लगना शुरू हो जाते है। 1816ई0 में जेम्स वेली फ्रेजर के दल के लोग जब गंगांत्री पहुंचे तो तीर्थ के वातावरण आैर दृश्य देख कर चकित रह गये थे।इसके किनारे बसे नगरों में शिवालिक पर्वत माला के आस-पास का क्षेत्र सदियों से साधु -संतो के तप व सिद्वि के स्थल रहे रहे है। 
(चित्र गंगोत्री मंदिर : गंगोत्री)

हिमालय की कंदराअो में महर्षि व्यास ने पुराणों की रचना की।उत्तर दिशा से भागीरथी तथा पूरब दिशा से अलकनन्दा के संगम के बाद ही इन नदियों का नाम गंगा पडता है  । इसके किनारे बसे नगर को देवप्रयाग कहते है जिसे सुदर्शन तीर्थ के रूप में भी जाना जाता हैं। भागीरथी के पावन संगम पर बसे पंचप्रयागों में यह एक प्रमुख प्रयाग है। 
<---(चित्र--देवप्रयाग,भागीरथी व अलकनन्दा का संगम)

        (चित्र :कुम्भनगरी हरिद्वार) ----->                                                                                               


ऋषिकेश तो ऋषियों की तपस्थली रहा है ,प्राचीन समय में यह अग्नि स्थान एंव वैष्णव तीर्थ के रूप में विख्यात हो चुका था । गंगाद्वार अर्थात हरिद्वार से कौन परिचित नही है यही से गंगा का मैदानी सफर शुरू हो जाता है । कहते है गंगा सब जगह आसानी से मिल जाती है पर प्रयाग सागर संगम एंव हरिद्वार में गंगा तक पहुंचना दैवीय कृपा होती है इस पौराणिक कुम्भ नगरी का महामत्य बहुत अधिक  है आगामी 2010 में कुम्भ मेला भी अबकी बार हरिद्वार में ही पड रहा है जिसमें भाग लेने देश से ही नही देश से भी साधु-महात्माआे एंव आम लोगों के अलावा शासन प्रशासन की भी तैयारियां शुरू हो चुकी है।
गंगातटीय नगरों मे प्रयाग व त्रिवेणी संगम का भी बहुत महत्व है । गंगा यमुना के संगम में स्नान करने वालों को 10 यज्ञों का लाभ मिलता है क्योकि संगम पर देवताआे , द्विकपालों , लोकपालों ,सिद्वों सनतकुमारों ,सूयदेव आैर महाविष्णु का निवास है । सांस्कृतिक एंव एतिहासिक  नगरी प्रयाग गुप्तकाल में अपने उन्नति के  चरमोत्कर्ष पर थी ।चीनी यात्री हृवेनसांग 629 में प्रयाग में हर्षवद्वन द्वारा आयोजित धार्मिक सम्मेलन में  भाग लेने आया था ।
 काशी या वाराणशी भी उत्तरवैदिक  काल में परम ख्याति पर थी । हुवेनसांग ने उल्लेख किया है कि वाराणसी हर्ष साम्राज्य का समृद्वशाली  भाग थी । काशी शिक्षा ,विज्ञान ,एंव संगीत का केन्द्र बनी तो में काशी सातवीं शताब्दी में आयुवेदाचार्यों का सम्मेलन वर्ष भर चलता था। गंगा किनारे जो भी संस्कुति पनपी वह विकसित व समृद्व ही रही । इस देवतुल्य नदी ने हम मनुष्यो को क्या नही दिया आैर हमने बदले में गंगा नदी को क्या दिया ? यह बाद में, पहले थोडा इसके  किनारे बसे नगरों के वैभवशाली अतीत पर नजर डालते हुए आगे  बढते  है ..........  



काशी के घाटों तथा पाठशालाआे में महान विभूतियां पैदा हुई । काशी भक्ति आंदोलन का केन्द्र बनी तो 19वी सदी में पुनरूत्थान का केन्द्र बनने का गौरव भी इसे ही प्राप्त हुआ । इस नगरी ने भारत को कला ,साहित्य ,दर्शन ,संगीत नृत्य एंव शिक्षा के क्षेत्र में भी महान उपलब्धियां प्रदान की ।यहां  गंगा की लहरों में वाराणसी की प्राचीन संस्कृति का संगीत आज भी सुनायी देता है।
एक आेर महत्वपूर्ण प्राचीन एतिहासिक नगर का नाम गंगा से जुडा है वह है पाटलिपुत्र जहां गंगा व सोन नदी के संगम पर राजनीतिशास्त्र,बौद्व व जैनधर्मो  ने अपना विकास  किया ,सम्राट अशोक भी यही की देन है। जिसने बौद्व धर्म का प्रचार प्रसार दूसरे देशों में किया। इसी तरह कन्नौज,काम्पी एंव बिठ्रठूर जैसे गंगा  के किनारे बसे नगरों का सम्बन्ध सांस्कतिक  एंव साहित्यिक आंदोलनों से रहा है।..................शेष अगले भाग में (वर्तमान परिपेक्ष्य में गंगा) 


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(कुछ चित्र गुगल से साभार)






















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Friday, September 25, 2009

गंगा नदी ही नही एक अद्भभुत संस्कृति भी



गंगा नदी ही नही अद्वभुत संस्कृति - भाग--2........................गंगा की वैभवता,पवित्रता एंव विशालता ने प्राचीन समय से ही सभी को प्रभावित किया है।गंगा अवतरण की मिथक का वर्णन पुराणों में ही नही वरन साहित्य कला संस्कृति एंव मूर्ति कला में भी कलाकारों ने र्दशाया । कालिदास ने गंगा को मोतियों की माला की संज्ञा दी है, जिसे पृथ्वी ने अपने गले में सजाया हुआ है। 17वी शताब्दी में राजा तिरूमल नायकर के दरबार में एक संस्कृत कवि नीलकंठ दीक्षित ने गंगावतरण नाम का महाकाव्य रचा ।वाल्मीकी ने रामायण में गंगावतरण की घटना का आलौकिक वर्णन किया है। अपने ग्रन्थ गंगा लहरों जगन्नाथ पंडित ने गंगा को समस्त नदियों में श्रेष्ठ कहा जिसे शिव की जटाआे में वास करने का सौभाग्य मिला।उन्होने गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर आने को उसका महान त्याग बताया ,6वी शताब्दी में किरार्जुनीय में भारवी ने उत्तररामचरितमें भवभूति ने गंगा के असीम वैभव का वर्णन किया।तमिल साहित्य में भी गंगा की पवित्रता एंव विश्वास  के उदाहरण मिलते है।
चित्रकारों एंव मूर्तिकारों ने भी गंगावतरण की आलौकिकता का चित्रण किया । आन्ध्र प्रदेश के नगर नेपाजी मंदिर में भित्ति चित्र में भगवान शिव की जटाअो में गंगा के वास करने के कारण  पार्वती को प्रसन्न करने का चित्र मिलता है।मूर्तियों में गंगा के विभिन्न रूपों को उकेरा गया है। उत्तर प्रदेश के अहिछत्र में गंगा की शिव के पास दक्षिणामूर्ति के धनी दक्षिणामुर्ति में तथा दूसरी शताब्दी के कुषाण युग की मूर्तिया एंव मानवीय स्वरूप में गंगा पशिचमी बंगाल के मुर्षिदाबाद में मूर्ति प्राप्त होती हैअपनी उच्चकोटि की मूर्ति कला के धनी दक्षिण भारतीय मूर्ति कारों ने गंगावतरण का कलात्मक वर्णन महाबलिपुरम के अज्ञात मूर्ति कारों ने किया हैनरिक जिमकर ने आइ आफ इंडियन एशिया में लिखा है कि" एक बहुत बडी चट्टान पर बने एक चित्र में गंगावतरण की कहानी है। सातवी शताब्दी में गंगावतरण का निरूपण मामल्लपुरम में शिलाआे में तराशे हुए उच्चित्रों में से एक भव्य कृति में हुआ है यही नही भारतीय संगीत में विभन्न रागों के माध्यम से भी गंगावतरण की चर्चा संगीत में हुई है।

इस पवित्र नदी के किनारे जो संस्कृति पल्लवित हुई उसके विकास की गाथा तो बहुत विस्तृत है । वैदिक काल में केवल एक ही बार गंगा का उल्लेख आया है।इस समय गंगा एक भव्य नदी थी जिसमें नावें चलती थी आैर गंगा के मुहाने बसा ताम्रलिप्ती नगर पूरा पत्तन नगर बन चुका था ,इण्डोनेशिया,चीन एंव श्रीलंका से आने वाले यात्री ताम्रलिप्ती बंदरगाह पर ही आते थे ।वैदिक काल के बाद की साहित्यिक कृतियों में गंगा तटों पर विकसित हुई संस्कृति का वर्णन मिलता है।जिसमें गंगा के  आस-पास के इलाकों का आर्थिक ,व्यापारिक,राजनैतिक एंव सामाजिक स्थिति का पता चलता है।इसके अलावा तत्कालीन वनस्पतियों ,प्राकृतिक संसाधनों वन्य प्राणियों के बारे में जानकारी मिलती है। बाण के हर्षचरित में वर्णन है कि गंगा तट पर बसें मथुरा व काशी में कपडों की मंडियां  विकसित हो चुकी थी ।गंगा के डेल्टा के लोग ताम्रलिप्ती पतन से आयात-नियात का काय करते थे आैर गुप्त काल में यहां के लोगो का जीवन स्तर बहुत उपर था। भारत के सुप्रसिद्व विद्वान वैज्ञानिक.डा0एम.एस.स्वामीनाथन के शब्दों में "वेदों से आधुनिक युग तक मनीषियों ने अनेक रूपों में गंगा पर विशद प्रकाश डाला है उस वृहद साहित्य के बीच  पेठने की शक्ति कुछ ही लोगो में है उस साम्रगी का आस्वाद मात्र पढकर ही नही किया जा सकता ,इसके लिए संवेदनात्मक रूप से उसके जुडाव को जानना भी आवश्यक है " .............आगे जारी है

Sunday, September 20, 2009

गंगा नदी ही नही एक अद्भभुत संस्कृति





 गंगा एक विशाल नदी है,  जो हिमालय से सागर को जोडते हुए गंगासागर तक  की लगभग 2525कि0 मी0 की यात्रा के दौरान 21प्रथम त्रेणी,22द्वितीय त्रेणी तथा 48 साधारण श्रेणी के नगरों से गुजरती है।हिमालय की पर्वत श्रेणियों  की पुरातत्वीय  गुफाओ में जीते भौगौलिक प्रदेशों को नापतें ,एतिहासिक घटनाओ को समेटते हुए इस नदी ने जीवन संस्कृति को प्रभावित किया है।जवाहर लाल नेहरू ने अपनी वसीयत में लिखा है कि है:-
"गंगा भारत की प्रतीक है लोग इससे प्यार करते है उनकी  स्मृतियां आशाएं  एंव विजय गीत हर एक निराशा और  पराजय भी गंगा से संबद्व है।"



 (गंगोत्तरी मंदिर,प्राचीन काल में यह लकडी व पत्थर का बना था)



( शिव, गंगा के वेग को धारण करते हुए )


भारत की समस्त नदियों में यही एकमात्र  ऎसी नदी है जो  स्वर्ग से उतर कर पृथ्वी पर आई है गंगावतरण की घटना  अपने आप में आलौकिक है जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे है। इसका वर्णन महाभारत के  वनपर्व ,बाल्मीकी रामायण  के बालकाण्ड ,ब्रह्रमाण्ड पुराण,पघ पुराण और भागवत पुराण में मिलता है पौराणकि कथाओ  के अनुसार गंगा की उत्पत्ति सृष्टि के रचयिता ......... ....ब्रहृमा के कमण्डल  के पवित्र जल से हुई है।जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लिया तो अपने त्रिवकिम रूप  से पृथ्वी तथा दूसरा पैर स्वर्ग की ओर बढाया तो विष्णु के चरणो से आकाशगंगा की उत्पत्ति हुई  और यह आकाशगंगा कैलाश पवत के इर्द-गिर्द इठलाती रही । कई शताब्दियों तक यह आकाशगंगा विष्णुपदी के रूप में आकाश में विचरण करती रही । सगर वंश के कई राजाओ ने अपने पुरखों की अस्थियों को पवित्र कराने के लिए पीढी दर पीढी अथक प्रयत्नशील रहे ।तत्पश्चात  कई वर्षो के कठाेर तप के बाद भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर आने के लिए राजी कर लिया। गंगा के मन में अंहकार पैदा हो गया और उसने सोचा कि वह शिव को अपने साथ पताल ले जायेगी गंगा के पृथ्वी पर अवतरित होने से पृथ्वी को अपने विनाश की चिन्ता हुई और ब्रहृमा की शरण में गयी ब्रहृमा ने पृथ्वी को शिव की तपस्या करने को कहा क्योकि वही गंगा के वेग को आधार प्रदान कर सकते थे ।भगीरथ ने शिव की एक पैर से तपस्या की,उसकी तपस्या से प्रसन्न हो शिव ने गंगा को अपने सिर पर जटाओ में धारण कर लिया फिर धीरे-धीरे अपनी जटाओ  से गंगा को मुक्त किया और वह बहती हुई सात धाराओ में बट गयी जिसमें से तीन  और अंतिम धारा भगीरथ के पीछे चल कर अपने गन्तव्य की ओर पहुंची............।
अगर गंगा के लौकिक पक्ष को देखे तो गंगा की भगीरथी तथा अलकनन्दा दो धारायें हिमाचल की चौखम्बा गढवाल हिमालय पवत श्रृंखला के सतोपथ शिखर से दो विपरीत दिशाओ में बहने वाली पनढाली के पाद प्रदेश में बने सरोवरों से निकलती है ।विपरीत दिशाओ में बहती हुई दोनों धारायें देवप्रयाग में आकर मिल जाती है और  इसी स्थान से अलकनन्दा एंव भागीरथी धारायें गंगा बन कर ऋषिकेश को पार करती हुई मैदानी भागो में पर्दापण करती है।गंगा का वास्तविक स्रोत गंगोत्री ग्लेशियर है संतोपंथ शिखर से गौमुख तक यह शिखर ग्लेशियर 30 कि.मी.लम्बा और 2से 3 कि.मी. चौडा है।......जारी   है  दुसरे भाग में .................................

Thursday, September 17, 2009

गंगा मै तेरे कितने करीब हूं ?







गंगा मै तेरे कितने पास होते हुए भी दूर हू,
याद आता है वो बचपन
जब मन किया ,खेल लिया करते रेत में,
बनाते घरौदें ,मंदिर ,मूरत
फिर पत्थरों का पुल न बना पाने की कोशिश
रूला देती सबकों
फिर भी नन्हें हाथों से बना ही लेते ,रेत से


गंगा मै तेरे पास होते हुए भी दुर हूं.........!

तेरे विशाल प्रवाह से बच,
किनारे-किनारे तैरने की
असफल कोशिशे
कैमरा ले उतार लेना तेरे
छायाचित्र ,खुद को समझ
एक माडल पानी में खिचवाना
अपने चित्र

                                 गंगा मै तेरे कितने पास होते हुए भी दूर हूं.........!



बहू बन कर देती हूं
मंगलद्वीप प्रजवल्लित
और बहा देती हुं तेरे
प्रवाह में कितने ही अमंगल
दूर होने पर ,तेरी लहरें
गुंजती है बस संगीत बनकर
भूल जाती हूं अपने सारे दर्द
जल लेकर अंजुली भर



गंगा में तेरे कितने पास होते हुए भी दूर हूं..............!
  
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