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यह ब्लाग समर्पित है मां गंगा को , इस देवतुल्य नदी को, जो न सिर्फ मेरी मां है बल्कि एक आस्था है, एक जीवन है, नदियां जीवित है तो हमारी संस्कृति भी जीवित है.
Monday, February 18, 2013
गंगा की निर्मलता व अविरलता के लिए कृतसंकल्प है उत्तराखण्ड सरकार
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Monday, January 14, 2013
एक संवाद मां गंगा के साथ.....
एक संवाद मां गंगा के साथ
मां आज तुम बहुत खुश हुई होगी
तुम्हारे बेरहम बच्चों ने
पुण्य कमाने के लिए
बस स्नान मकर सक्रांति
के नहान के नाम पर
संगम में पुण्य के लिए
कुछ ने पाप धोने के लिए
सैकडों हजारों की संख्या
में डूबकी लगाई होगी
पर मै जो तुम्हारी
बेटी कसम खाई है
जब तुम्हे तुम्हारा
वही निर्मलता
शु़द्वता से दुबारा
परिचित कराने में
तुम्हारे खोये स्वरूप को
लौटाने में मेरे बस में
जो होगा वह मै
अपने अन्तिम क्षण
तक करूगी तब तक
कितने ही नहान पर्व हो
तुम्हारे जल में स्नान
न करूगी..........!
मां आज तुम बहुत खुश हुई होगी
तुम्हारे बेरहम बच्चों ने
पुण्य कमाने के लिए
बस स्नान मकर सक्रांति
के नहान के नाम पर
संगम में पुण्य के लिए
कुछ ने पाप धोने के लिए
सैकडों हजारों की संख्या
में डूबकी लगाई होगी
पर मै जो तुम्हारी
बेटी कसम खाई है
जब तुम्हे तुम्हारा
वही निर्मलता
शु़द्वता से दुबारा
परिचित कराने में
तुम्हारे खोये स्वरूप को
लौटाने में मेरे बस में
जो होगा वह मै
अपने अन्तिम क्षण
तक करूगी तब तक
कितने ही नहान पर्व हो
तुम्हारे जल में स्नान
न करूगी..........!
Sunday, January 6, 2013
इलाहाबाद (प्रयाग) महाकुम्भ.. ......2013
इलाहाबाद (प्रयाग) लगभग 65 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है तथा उत्तरप्रदेश राज्य में 25.3 उत्तरी अक्षांश व 8155 पुर्वी देशांश पर स्थित है । दिल्ली से इसकी दुरी 612 कि.मी. है और मुबई से 1502कि.मी. । यह भारत का प्राचीनतम शहर है बसा है गंगा ,यमुना और पौराणिक सरस्वती नदी के संगम पर । हिन्दुओ का अति पवित्र ऎतिहासिक नगर इलाहाबाद पहले प्रयाग के नाम से विख्यात था, स्कन्द पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्रमा जी ने यज्ञ आयोजित करने के लिए गंगा ,यमुना और सरस्वती द्वारा घिरे हुए एक प्रमुख भू-खण्ड का चयन किया जो बाद में प्रयाग के नाम से जाना गया ।सागर मंथन के उपरान्त देवताओ व असुरों के अमृत प्राप्ति के लिए हुए झगडे में अमृत कलश से कुछ बूंदे यहां भी गिर गयी तभी से यह स्थान तीर्थराज के नाम से भी जाना जाता है ।
इलाहाबाद प्रयाग का अपना एक स्वर्णिम इतिहास है अयोध्या से निष्कासन के बाद भगवान राम ने भी यहां कुछ समय व्यतीत किया । 1584 में मुगल बादशाह अकबर ने त्रिवेणी संगम पर एक प्रतापी संग्रामिक किले का निर्माण किया इस स्थान का अल्लाहबास अथवा इलाहाबाद नाम पड गया ।

कुम्भ मेला एक नित्य नवीन उत्सव है कुम्भ मेला भारत के अन्य तीन स्थानों पर होता है हरि़द्वार में गंगा तट पर ,उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर तथा नासकि में गोदावरी के तट पर ग्रहों के प्रभाव से कुछ विशिष्ट समयों पर समुद्र मंथन द्वारा प्राप्त अमृत इन नदियों में पुन: प्रकट होता है और इन नदियों का जल आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न हो जाता है । इस समय इन नदियों में स्नान करने से मुक्ति प्राप्त होती है ।
वर्ष 2001 में कुम्भ मेला यहां 44 दिनों के लिए था जबकि कुम्भ 2013......कुल 55 दिनों के लिए होगा । इस दौरान इलाहाबाद प्रयाग सर्वाधिक आबादी वाला शहर बन जाता है ।
कुम्भ 2013 के पमुख स्नान ।
मकर संक्राति ........14.1.2013.............शाही स्नान
पौष पूर्णिमा........... 27.1.2013
मौनी अमावस्या.......10.2.2013.............शाही स्नान
बसन्त पंचमी...........15.2.2013 .............शाही स्नान
माघी पूर्णिमा .......... 25.2.2013
महाशिवरात्रि........... 10.3.2013

कुम्भ मेला एक नित्य नवीन उत्सव है कुम्भ मेला भारत के अन्य तीन स्थानों पर होता है हरि़द्वार में गंगा तट पर ,उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर तथा नासकि में गोदावरी के तट पर ग्रहों के प्रभाव से कुछ विशिष्ट समयों पर समुद्र मंथन द्वारा प्राप्त अमृत इन नदियों में पुन: प्रकट होता है और इन नदियों का जल आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न हो जाता है । इस समय इन नदियों में स्नान करने से मुक्ति प्राप्त होती है ।
वर्ष 2001 में कुम्भ मेला यहां 44 दिनों के लिए था जबकि कुम्भ 2013......कुल 55 दिनों के लिए होगा । इस दौरान इलाहाबाद प्रयाग सर्वाधिक आबादी वाला शहर बन जाता है ।
कुम्भ 2013 के पमुख स्नान ।
मकर संक्राति ........14.1.2013.............शाही स्नान
पौष पूर्णिमा........... 27.1.2013
मौनी अमावस्या.......10.2.2013.............शाही स्नान
बसन्त पंचमी...........15.2.2013 .............शाही स्नान
माघी पूर्णिमा .......... 25.2.2013
महाशिवरात्रि........... 10.3.2013
Sunday, December 2, 2012
श्रद्वालुओ की सिद्वियों का केन्द्र भैरव मंदिर .....ऋषिकेश (अन्तिम भाग)
शिव की अनेक अशांत मुर्तिया उस वर्ग की है ,जो उनसे संबद्व किसी पौराणिक कथा का चित्रण नही करती अथवा उसमें कथा तत्व अस्पष्ट होता है । इसी तथ्य को लेते हुए इस मंदिर में प्रतिष्ठत बटुक नाथ भैरव रूद्र शिव का महत्वपूर्ण रूप है जो मध्यकाल में यहां प्रचलित हो चुका था । डा0 शिवप्रसाद नैथानी लिखा है कि "कालिकागम (20-25) में प्राचीन काल में पुरनिवेश में इस तरह की कई बातों का ध्यान रखा जाता था जैसे देवतायन बने वह नगाभिमुख हो शिवलिंग और भैरव की स्थापना हो तो वह बस्ती के बाहर हो शमशान घाट दक्षिण में हो आदि ।" यह मंदिर भी इसी क्रम में बस्ती के बाहर तथा शमशान घाट के नजदीक ही है । ऋषि केश के लिए कुब्जाम्रक शब्द ऎतिहासकि एवं पौराणिक है और 2200 वर्ष पहले का माना गया है । कुब्जाम्रक पुरनिवेश होने के कारण यह मंदिर लगभग इतना ही पुराना है । यह बात जरूर ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान में बने इस मंदिर से पहले यहां भैरव की मूर्ति एक झोपडें में थी बाद में इसका विस्तार किया गया ।
भैरवनाथ मंदिर में भैरव वास्तव में वैदिक रूद्र के व्याध कृत्य का पथप्रदर्शक है । डा0 यशवंत सिंह कठोच ने गढवाल में प्राप्त मुर्तियों को निश्चित रूप से तांत्रिक कहा है । प्रो0 बनर्जी ने "भैरव और योगनियों में घनिष्ठ संबन्ध बतलाते हुए कहा कि इसमें कुछ भी संदेह नही कि भैरवों व योगनियों को सम्रग संकल्पना स्वरूप में पूर्णत: तांत्रिक है "। यही नही बागची ने अपनी पुस्तक दि"कल्चरल हेरिटेज आफ इंडिया,खण्ड 4पृ0216 में तंत्रों के विकास पर विचार करते हुए लिखा है कि "अष्टमालों के प्रणेता भैरव मानव आचार्य प्रतीत होते है जो पूर्ण आध्यात्मिक मुक्ति पाकर प्राय: शिव रूप हो चुके थे ।" इतिहास वेत्ताओ ने इस संबन्ध में एक निष्कर्ष यह भी निकाला कि ऋषिकेश मंदिर के अधोतल में स्थित पतालेश्वर महादेव से थोडी दूर पर इस गण प्रमुख एवं अनति पर स्थित वीरभद्र प्रधानगण स्थित होने के कारण प्राचीन तट पर शैव तीर्थ पर परवर्तीकाल में क्रमश: वैष्णव संप्रदाय और पश्चात रामावत तथा शक्ति संप्रदाय का भी युग विशेषों में प्रभाव रहा है ।
नवंबर माह में भैरव अष्टमी के दिन मंदिर में भैरव की विषेश पूजा अर्चना की जाती है भैरव की ज्योति का प्रतीक एक अखण्ड दीपक मंदिर में हमेशा प्रज्जवलित रहता है।भगवान शिव के अशांत रूप की नही अपितु संहारक रूप की पूजा भी श्रद्वालुओ द्वारा समान रूप से की जाती है शनिवार के दिन यहां अधिक श्रद्वालु आते है इस स्थान की महत्ता बहुत अधिक है क्योकि लोगों को सिद्वियों की पूर्ति में भैरवनाथ का विशेष महत्व है इसीलिए उनके इस प्राचीन व दुर्लभ रूप के दर्शनों के लिए श्रद्वालु दूर- दूर से आते है।
भैरवनाथ मंदिर में भैरव वास्तव में वैदिक रूद्र के व्याध कृत्य का पथप्रदर्शक है । डा0 यशवंत सिंह कठोच ने गढवाल में प्राप्त मुर्तियों को निश्चित रूप से तांत्रिक कहा है । प्रो0 बनर्जी ने "भैरव और योगनियों में घनिष्ठ संबन्ध बतलाते हुए कहा कि इसमें कुछ भी संदेह नही कि भैरवों व योगनियों को सम्रग संकल्पना स्वरूप में पूर्णत: तांत्रिक है "। यही नही बागची ने अपनी पुस्तक दि"कल्चरल हेरिटेज आफ इंडिया,खण्ड 4पृ0216 में तंत्रों के विकास पर विचार करते हुए लिखा है कि "अष्टमालों के प्रणेता भैरव मानव आचार्य प्रतीत होते है जो पूर्ण आध्यात्मिक मुक्ति पाकर प्राय: शिव रूप हो चुके थे ।" इतिहास वेत्ताओ ने इस संबन्ध में एक निष्कर्ष यह भी निकाला कि ऋषिकेश मंदिर के अधोतल में स्थित पतालेश्वर महादेव से थोडी दूर पर इस गण प्रमुख एवं अनति पर स्थित वीरभद्र प्रधानगण स्थित होने के कारण प्राचीन तट पर शैव तीर्थ पर परवर्तीकाल में क्रमश: वैष्णव संप्रदाय और पश्चात रामावत तथा शक्ति संप्रदाय का भी युग विशेषों में प्रभाव रहा है ।
नवंबर माह में भैरव अष्टमी के दिन मंदिर में भैरव की विषेश पूजा अर्चना की जाती है भैरव की ज्योति का प्रतीक एक अखण्ड दीपक मंदिर में हमेशा प्रज्जवलित रहता है।भगवान शिव के अशांत रूप की नही अपितु संहारक रूप की पूजा भी श्रद्वालुओ द्वारा समान रूप से की जाती है शनिवार के दिन यहां अधिक श्रद्वालु आते है इस स्थान की महत्ता बहुत अधिक है क्योकि लोगों को सिद्वियों की पूर्ति में भैरवनाथ का विशेष महत्व है इसीलिए उनके इस प्राचीन व दुर्लभ रूप के दर्शनों के लिए श्रद्वालु दूर- दूर से आते है।
Wednesday, November 28, 2012
श्रद्वालुओं की सिद्वियों का केन्द्र...........भैरव मंदिर ऋषिकेश
ऋषिकेश के लक्ष्मणक्षूला मार्ग में चन्द्रभागा नदी के पुल को पार करते ही ,भैरवनाथ का प्राचीन मंदिर स्थित हे । इस मंदिर में भैरव की विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठत है ।
गढवाल में भारत के अन्य भागों की तरह शिव प्रतिमा के दो रूप प्राप्त होते है ,लिंग प्रतिमा व रूप प्रतिमा । रूप प्रतिमा में शिव को विभिन्न मूर्तियां परिलक्षित हई । जिसमें शिव की वीणाधर दक्षिणामूर्तियां,कल्याण सुंदर मूर्ति,शिवनृत मुर्ति, उमामहेशवर मुर्ति, हरिहर मूर्ति एवं भैरवमूर्ति सम्मिलित है। इस क्रम में शिव की शान्त मूर्तियों में दक्षिणामुर्तियां शिव के ज्ञान विज्ञान और कलाओ के उपदेशक के रूप कल्याण सुंदर मुर्ति प्रसिद्व रूप नटराज की है । उमामहेश्वर व हर गौरी रूप गढवाल हिमालय में सर्वाधिक प्रचलित रूप रहा है। उमामहेश्वर की मूर्तियां एकता के तांत्रिक
सिद्वांत पर बल देती हैं । हरिहर की मुर्तिशिव परिवार में वर्णित है , यह शिव की सौम्य लीला मर्ति मानी जाती है ।उपरोक्त सभी मूर्तिरूव शिव के सौम्य रूप को दर्शाती है ।भगवान यिव का सौम्य व शांत रूप ही नही वरन उनके उग्र व अशांत रूप की प्रतिमायें भी मिलती है । हिन्दू त्रिमूर्ति में उनका संहार रूप भी प्रकल्पित हुआ है । इस केदार भूमि में शिव के अनेकों रूपा के की पूजा की जाती रही है भैरव रूप की महत्ता का वर्णन स्कन्द पुराण में मिलता है । जिसके अनुसार "तत्रैप गुणपों नाम भैरवों भीषणा कृति
यस्य दर्शन मांत्रेण नरो यति परागतिमा "।।(स्कन्द पुराण 9121अध्याय)
इसका तात्पर्य है कि गणप नामक भैरवनाथ के दर्शन को प्राप्त कर मनुष्य परम गति को प्राप्त होता हैं।
जारी है ...........आगे जानने के लिए देखते रहे , ब्लाग गंगा के करीब
गढवाल में भारत के अन्य भागों की तरह शिव प्रतिमा के दो रूप प्राप्त होते है ,लिंग प्रतिमा व रूप प्रतिमा । रूप प्रतिमा में शिव को विभिन्न मूर्तियां परिलक्षित हई । जिसमें शिव की वीणाधर दक्षिणामूर्तियां,कल्याण सुंदर मूर्ति,शिवनृत मुर्ति, उमामहेशवर मुर्ति, हरिहर मूर्ति एवं भैरवमूर्ति सम्मिलित है। इस क्रम में शिव की शान्त मूर्तियों में दक्षिणामुर्तियां शिव के ज्ञान विज्ञान और कलाओ के उपदेशक के रूप कल्याण सुंदर मुर्ति प्रसिद्व रूप नटराज की है । उमामहेश्वर व हर गौरी रूप गढवाल हिमालय में सर्वाधिक प्रचलित रूप रहा है। उमामहेश्वर की मूर्तियां एकता के तांत्रिक
सिद्वांत पर बल देती हैं । हरिहर की मुर्तिशिव परिवार में वर्णित है , यह शिव की सौम्य लीला मर्ति मानी जाती है ।उपरोक्त सभी मूर्तिरूव शिव के सौम्य रूप को दर्शाती है ।भगवान यिव का सौम्य व शांत रूप ही नही वरन उनके उग्र व अशांत रूप की प्रतिमायें भी मिलती है । हिन्दू त्रिमूर्ति में उनका संहार रूप भी प्रकल्पित हुआ है । इस केदार भूमि में शिव के अनेकों रूपा के की पूजा की जाती रही है भैरव रूप की महत्ता का वर्णन स्कन्द पुराण में मिलता है । जिसके अनुसार "तत्रैप गुणपों नाम भैरवों भीषणा कृति
यस्य दर्शन मांत्रेण नरो यति परागतिमा "।।(स्कन्द पुराण 9121अध्याय)
इसका तात्पर्य है कि गणप नामक भैरवनाथ के दर्शन को प्राप्त कर मनुष्य परम गति को प्राप्त होता हैं।
जारी है ...........आगे जानने के लिए देखते रहे , ब्लाग गंगा के करीब
Saturday, August 11, 2012
कहां है वह स्थान जिनके बारे में पुराणों में उल्लेख मिलता है ।
कहां है वह स्थान जिनके बारे में पुराणों में उल्लेख मिलता है कही इन्सानी बस्ती व उसकी बढती जरूरतों के कारण क्रंकरीट के विशालकाय जंगलों में प्रकृति कही गुम तो नही हो रही ।आधुनिक और के विकास के नाम पर सभ्यता व संस्कृति जैसे शब्द मायने खोते जा रहे है ।जो सुन्दरता प्रकृति में है वह सुन्दर अटिट्लकाओ में कहां । यहां यह कहने का मतलब बिलकुल भी नही की हम आदिवासी बन जाये ,कन्दराओ में निवास करे ।
कोशिश है तो बस इतनी ही की जो हमारी संस्कृति का हिस्सा है ध्यान रहे,वह नष्ट न होने पाये । गंगा के करीब ब्लाग पर प्राचीन पौराणिक मंदिरो स्थलों के बारे में जानकारी देने का मकसद सिर्फ इतना ही है की कभी हम इन स्थानों पर आये तो यहां की पौराणिकता तथा ऎतिहासकिता का हमें भान रहें..............।
गंगा के करीब पर आगे की पोस्टों में पढे अन्य धार्मिक एवं पौराणिक जगहो व मंदिरों के बारे में । keep visiting
Ganga Ke Kareeb htttp://sunitakhatri.blogspot.com
Monday, July 23, 2012
चन्द्रेश्वर महादेव मंदिर, ऋषिकेश
·
· · मंदिरों की नगरी ऋषि केश में हिन्दुओ के प्रमुख ईष्ट महादेव शिव के तीन सिद्वस्थल है जिसमें से दो सि़द्वपीठों में सोमेश्वर व वीरभद्रेश्वर के बारे में आप इसी ब्लाग पर पढ सकते है ।लक्ष्मण झूला मार्ग पर चन्द्रभागा पुल को पार कर चन्द्रेशवर नगर में गंगा नदी के करीब यह मंदिर स्थित है ।यह स्थान बेहद रमणीक जहां शिव भक्तों की आवाजाही ,पूजा अर्चना हमेशा चलती रहती है।
पौराणिक आख्यानों के अनुसार समुद्र मंथन के बाद आदिकाल में चन्द्रमा ने इसी स्थान पर हजारों वर्षो तक भगवान शिव की कठिन तपस्या की । चन्द्रमा की अराधना से प्रसन्न हो
पौराणिक आख्यानों के अनुसार समुद्र मंथन के बाद आदिकाल में चन्द्रमा ने इसी स्थान पर हजारों वर्षो तक भगवान शिव की कठिन तपस्या की । चन्द्रमा की अराधना से प्रसन्न हो
·
शिव ने चन्द्रमा को साक्षात् दर्शन देकर वर मांगने को कहा चन्द्रमा हाथ जोडकर प्रार्थना करते हुए भगवान शिव से विनती की" हे वृषभध्वज ,मुझे अपने सानिध्य में रखकर सेवा करने का अवसर प्रदान करें ।"शिव चन्द्रमा को वरदान देते हुए कहा" हे, देव मै तुम्हारी अराधना से प्रसन्न हो तुम्हे अपने मस्तक पर स्थान देता हूं । "जिस स्थान पर बैठकर चन्द्रमा ने शिव की घोर तपस्या की उसी स्थान पर शिव स्वयं लिंग रूप में प्रकट हुए उन्होने चन्द्रमा को वर देते हुए यह भी कहा कि भविष्य में यह स्थान संसार में चन्द्रेश्वर के नाम से प्रसिद्व होगा ।
स्कन्द पुराण के केदारखण्ड में गंगा जी की तीर्थ श्रृंखला क्रम में श्री चन्द्रेश्वर महादेव के सामने कुमुद तीर्थ गंगा का वर्णन है यह स्थान कुमुद तीर्थ का स्थान ही है मंदिर के सामने समीप ही गंगा अपनी पावनता के साथ बह रही है ।
मंदिर के प्रागंण में खडे होकर पुर्व दिशा में देखने पर चन्द्रकूट पर्वत की आकृति द्वितीया के चन्द्रमा की तरह दिखलायी देती है ।
मान्यताओ के अनुसार चन्द्रेश्वर महादेव लिंग पर 40 दिनों तक दूध से अभिषेक करने पर पुत्र-धन-धान्य की प्राप्ति होती है ।श्रावण मास में रूद्राभिषेक व जलाभिषेक का विशेष महत्व है ।
मंदिर के प्रागंण में खडे होकर पुर्व दिशा में देखने पर चन्द्रकूट पर्वत की आकृति द्वितीया के चन्द्रमा की तरह दिखलायी देती है ।
मान्यताओ के अनुसार चन्द्रेश्वर महादेव लिंग पर 40 दिनों तक दूध से अभिषेक करने पर पुत्र-धन-धान्य की प्राप्ति होती है ।श्रावण मास में रूद्राभिषेक व जलाभिषेक का विशेष महत्व है ।
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