Wednesday, March 31, 2010

बड़ सुख सार पाओल......... गंगा की गोद में !


बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !

हम भी कुंभ नहा आए! हरिद्वार के हर की पौड़ी में डुबकी लगाना जीवन का सबसे अहम अनुभव था। आप इसे मेरीधर्मांधता कहें या अस्था का पगलपन - पर हरिद्वार में गंगा तट पर उमड़ी लाखों की भीड़ आपके सभी तर्कों कोखोखला साबित कर देगी।
जब मैं गंगा के निर्मल जल में डुबकी लगा रहा था तो मेरे मन में मैथिल कवि विद्यापति की पन्क्तियां अनवरत गूंजरही थी ...

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !
छारैते निकट नयनन बह नीरे !!

एक अपराध छेमब मोर जानी !
परसल माय पाय तुअ पानी !!

कि करब जप-तप-जोग-ध्याने !
जनम कृतारथ एकही स्नाने !!

कर जोरि विनमओ विमल तरंगे !
पुनि दर्शन कब पुनमति गंगे !!

बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे !
छारैते निकट नयनन बह नीरे !!


हमारे प्राचीन ग्रंथों में कुंभ स्नान का महत्व का विस्तार से वर्णन किया गया है। भागवत के अनुसार अमृत दुर्वासा मुनि के शाप के कारण समुद्र के बीच मे घड़े मे़ सुरक्षित रह्ते हुए समा गया था। स्कंद पुराण के अनुसार एक बाररक्षसों और देवताओं में युद्ध छिड़ा। इस युद्ध में असुर पक्ष की विजय हुई। सारे देवता गण भगवान विष्णु के पासपहुंचे। उन्होंने भगवान विष्णु से अपने छीने हुए राज्य के वापसी की प्रर्थना की। विष्णु भगवान ने देवताओं कोसमुद्र मंथन की सलाह दी। उनकी सलाह पर अमल हुआ। समुन्द्र मंथन हुआ। इस मंथन में मंदराचल पर्वत मथानीके रूप में तथा नागराजा वासुकि रस्सी के रूप में प्रयुक्त किए गए। उसी घड़े को हाथ मे़ लिए समुद्र मंथन के समय धन्वन्तरि (विष्णु) प्रकट हुए थे।

मंथन से अमृत कलश निकला। उस अमृत कलश को पाने के लिए छीना-झपटी शुरु हुई। इन्द्र के पुत्र जयंत इसअमृत कुंभ को लेकर भागे। भागते वक़्त उनके कलश से अमृत चार स्थानों पर छलक कर गिरा। ये स्थान हैंहरिद्वार, नासिक, उज्जैन और प्रयाग। इसी कारण से कुंभ पर्व मनाया जाता है।

कुंभ के अवसर पर हरिद्वार शहर आध्यात्मिक गुरुओं, साधु-संतों की भीड़, होर्डिंग्स, पोस्टर, बैनर आदि से अटापड़ा है। प्रवचन, व्याख्यान की होड़ है। और हो भी क्यों नहीं! वर्षों से ली रही इस परंपरा (कुंभ) में मान्यता हैकि तैंतिस करोड़ देवी-देवता और अट्ठासी लाख ऋषि मुनि उपस्थित होते हैं। पुण्य नक्षत्र की घड़ी में वे पावन गंगामें डुबकी लगाते हैं। अब ऐसे माहौल में कोई डुबकी लगाए तो उसके पापों का क्षय भी तो होगा ही।
हरिद्वार में गंगा की कलकल ध्वनि के साथ जुटी भीड़ के कोलाह से अद्भुत समां बंधता है। कुछ लोग पर्यावरणऔर प्रदूषण को लेकर चिंतित नज़र आते हैं। कुंभ सेवा समिति भी है। इस बात की उद्घोषणा निरंतर होती रहती हैकि आप प्लस्टिक के सामान लेकर गंगा तट पर जाएं। साबुन-तेल आदि से स्नान करें।

और
वह भी उपाय भी है जिसके बारे में कुछ दिनों पुर्व ज्ञान जी के एक पोस्ट में देखा था। उसकी तस्वीर भी उठालाया।

गंगा के तट पर शाम को होने वाली आरती अद्भुत और रोमांचक है। एक साथ बजते घंटे और घड़ियाल और मनोरमदृश्य देख-सुन कर हम तो धन्य हो गए।
गंगा के तट पर पूजा-पाठ, हवन, पिंडदान, दीपदान, आदि हमारे आस्था और परंपरा के प्रतीक हैं। इन्हें कर्मकांडकहकर हम अपनी आधुनिकता की विद्वता का परिचय तो दे सकते हैं पर क्या आपको लगता नहीं कि हम पश्चिमके अंधानुकरण में बहुत कुछ खोते जा रहे हैं --और इसके एवज़ में पाया क्या है?

2 comments:

हरकीरत ' हीर' said...

कि करब जप-तप-जोग-ध्याने !
जनम कृतारथ एकही स्नाने !!

मनोज जी सारी बात आस्था की है ...मनो तो मैं गंगा माँ हूँ न मनो तो बहता पानी ......!!

Suman said...

nice