यह ब्लाग समर्पित है मां गंगा को , इस देवतुल्य नदी को, जो न सिर्फ मेरी मां है बल्कि एक आस्था है, एक जीवन है, नदियां जीवित है तो हमारी संस्कृति भी जीवित है.
Tuesday, May 7, 2013
Friday, June 10, 2011
गंगा दशहरा........तथा.... गंगा

गंगाअवतरण की घटना अपने आप में आलौकिक तथा ऎतिहासकि है जिस पर इस ब्लाग में पहले भी प्रकाश डाला जा चुका है ।गंगा अवतरण ने भारत की दशा-दिशा ही बदल दी थी इसी की स्मृति में होने वाला गंगा दशहरा का पर्व युग-युग तक भगीरथ आदि महापुरूषों की याद दिलाता रहेगा जिनके नाम ही कठिन परिश्रम के प्रतीक बन गये।गंगा की महिमा का वर्णन वेदों से लेकर सम्पूर्ण अवान्तर साहित्य में भरा हुआ है
गंगा दशहरा ज्येष्ठ शुक्ला दशमी को सम्पुर्ण भारत में महान धार्मिक पर्व के रूप में मनाया जाता है गंगा के अर्विभाव की यह कथा वाल्मीकिरामायण तथा महाभारतदि ग्रन्थों में बडे विस्तार से दी गयी है --
दशमां शुक्लापक्षे तु ज्येष्ठे मासे बुधेहनि ।
अवतोरर्णा यत:स्वर्गद्वस्तर्क्षे च सरिद्वरा।।
हरते दश पापानि तस्मादृशहरा स्मृता ।
जिसका अर्थ है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को बुधवार को हस्त नक्षत्र में गंगा स्वर्ग ये धरा पर अवतरित हुई थी । इस दिन स्नानादि शुभ कर्म करने से मनुष्यों के पापों का नाश होता है ।
भारत के लोग ही नही आज गंगा विदेशियों के लिए भी गंगा मां उनके मन भी आपार श्रद्वा व विश्वास गंगा के लिए जो जीवनदायिनी है ।भारत के पूर्व प्रधान मन्त्री जवाहर लाल नेहरू के मन में भी गंगा के प्रति अटूट स्नेह व विश्वास था । उन्होने गंगा के प्रति अपनी भाव भरी श्रद्वांजलि कुछ इस तरह दी थी जिसकी कुछ पक्तियां इस प्रकार है "गंगा भारत की खास नदी है,जनता को प्रिय है।
गंगा मेरे लिए निशानी है,भारत की प्राचीनता की ,यादगार की जो बहती आई है वर्तमान तक और बहती चली जा रही है भविष्य के महासागर की ओर ।"
(मेरे लिए सबसे अहम है बस मेरा यही चिन्तन जो भी लोगो के द्वारा इस नदी की पवित्रता को बचाने के लिए जो कुछ भी जागरूकता आयी क्या उससे सचमुच ही मां गंगा जिसके जल हमने प्रदुषित कर डाला क्या वह हमारे साथ इसी तरह साफ -सुथरे वेगमयी रूप में अपना भविष्य तय कर पायेगी?)
Wednesday, May 11, 2011
मां गंगा तेरी लहरों ने इस जग को क्या न दिया..........!
कल गंगा सप्तमी के दिन ऋषिकेश में अच्छी खासी
हलचल रही कुछ कार्यक्रमों में लोगो का ध्यान लगा रहा,
गंगा स्नान में दान पुण्य के कामों
के अलावा सांयकाल मां गंगा की भव्य
आरती त्रिवेणी घाट में आकर्षण का केन्द्र रही।
दूसरी तरफ परमार्थ निकेतन में चल रहे" गंगा सांस्कृतिक महोत्सव 2011" में परिधि आर्ट ग्रुप द्वारा आयोजित नृत्य नाटिका "गंगा अवतरण" की प्रस्तुति ने उपस्थित लोगो को मंत्रमुग्ध कर दिया । साथ ही लेजर लाइटों का प्रयोग वाटरफाल पर नृत्य नाटिका में इस तरह से हुआ कि लोगो को गंगा के स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित होने की स्वर्गीय घटना मानो जीवन्त हो उठी हो, सभी देखने वाले भावपूर्ण हो उठे ।

स्वामी चिदानंदसरस्वती व अन्य अतिथि गण
गंगा के स्वर्ग से धरा पर आने के अलावा
सांस्कृतिक पक्ष को नृत्य नाटिका में बताया गया।
भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न हो बह्रमा द्वारा वरदान देना।
पाकर कपिल मुनि का ज्ञान ,सगर पुत्रों ने किया बलिदान.........सबने किया तुम्हारा आवह्रान गंगा
जाओ धरा पर करने जनकल्याण.......
मै स्वर्ग की वासिनी वेगमयी, चंचल कैसे धरा मेरे वेग को संभाले.........!

बहृमा आज्ञा से भगीरथ ने फिर गंगा के वेग को संभालने मे समर्थ हाने के कारण शिव की घनघोर तपस्या की ।शिव ने भगीरथ की तपस्या से प्रस्न्न हो गंगा के वेग को धरती पर सीधे न डाल अपनी जटाओ में संभाला । गंगा अवतरण की इस आलौकिक घटना के बारे में आप इसी ब्लाग पर पढे "गंगा अवतरण़ एक आलौकिक कथा "


शानदार प्रस्तुति

गंगा का पृथ्वी पर अवतरण ......
अमृत दिया है मरघट -मरघट.....
बस्ती-बस्ती स्वर्ग दिया ,पुत्र सगर के तारे सब जग है ज्ञाता ...........

वह प्राणी अमर है जिसने भी तेरे जल का पान किया ...................
मां गंगा तेरी लहरों ने इस जग को क्या न दिया ......
...........................!
Sunita Sharma
freelancer journalist
all picture sources TV EYES NEWS NETWORK
Saturday, April 30, 2011
गंगा की दशा को सुधारने के लिए बनी परियोजना ........
प्रदुषित गंगा की दशा को सुधारने के लिए शायद सरकार को जो सुध आयी है उसके चलते 7,000 करोड रू0 की लागत से गंगा नदी को राष्ट्रीय गंगा नदी घाटी प्राधिकरण से साफ करने की परियांजना को मंजूरी दी गयी है इसमें केन्द्र 5100 करोड रू0 खर्च करेगा उत्तराखण्ड,उत्तर प्रदेश,बिहार ,झारखण्ड एवं पश्चिम बंगाल को राज्य सरकारे 1900 करोड रू0 का खर्च वहन करेगी । विश्व बैंक ने इस परियोजना को लगभग 4600 करोड रू0 का कर्ज देने की सहमति दी है इस परियोजना की समय सीमा आठ साल की रखी गयी है प्रधानमंत्री खुद इस प्राधिकरण की अध्यक्षता करेगें । इस परियोजना का उद्देश्य गंगा नदी का संरक्षण ,नदी घाटी की व्यापक योजना तथा प्रबंधन के जरिए गंगा नदी के पर्यावरणीय बहाव को सुनिश्चत करना है । इस परियोजना को पहले की परियोजनाओ से अधिक प्रभावी बनाया गया है जिसमें पर्यावरणीय नियमों का पालन ,नगर निगम के गंदे पानी के नालो ,औघौगिक प्रदुषण ,कचरे और नदी के आस पास के इलाको का बेहतर तथा कारगर प्रंबधन शामिल किया गया है ।

इस परियोजना का स्वागत है पर यहां यह भी उल्लेखनीय है जैसा कि हिन्दी दैनिक समाचार पत्र, हिन्दुस्तान के शुक्रवार, 29,अप्रैल के सम्पादकीय में लिखा गया एक कडवा सच है, "होना यह चाहिए था कि इस वर्ष हम गंगा एक्शन प्लान की रजत जंयती धूमधाम से मनाते ,लेकिन पिछले पच्चीस साल में इस प्लान ऎसा कुछ भी नही हुआ जिसे उपलब्धि के तौर पर पेश कर सके "।
1986 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में गंगा एक्शन प्लान की शुरूवात वाराणसी में हई थी इस योजना में 2,000 करोड रूपये खर्च कर चुकने के बावजूद गंगा में प्रदुषण घटा नही बल्कि बढा ही है । वास्तव में राजीव गांधी भविष्य दृष्टा थे उन्होने यह योजना अपनी व्यक्तिगत दिलचस्पी की वजह से शुरू करवायी थी अगर इस योजना को प्रभावी ढंग से लागू कर व सभी लोगो की निज की चेतना से मां गंगा व अन्य प्रदुषित होती नदियों के बारे ध्यान रखा होता तो शायद यह ब्लाग भी न लिखा गया होता। पढे अन्य पोस्ट " गंगा की इस हालत का जिम्मेदार कौन ?,गंगा नदी ही नही अद्धभुत संस्कृति .... कितने भी करोडो खर्च कर लो मां गंगा तब तक पुर्ण रूप से प्रदुषण मुक्त व स्वच्छ नही होगी जब जक गंदे नाले फैक्टियों के अपशिष्ट , मल, कुडा कचरा ,मरे हुए जानवर और यह भावना गंगा में प्रवाहित कर दो ,यह भावना मन से नही निकलेगी तब तक कितनी भी योजनाये बना लो कुछ नही होने वाला जहां तक बात जनता से सहयोग लेने की है तो यह कैसे संभव है जब उन्हे यही बताया जायेगा की गंगा में बहा दो, गंगा तो लोगो के अपशिष्ट बहा ले जाने मात्र के लिए जान पडती हो मानो .... तब उसके जल को आचमन के लिए लायक कब तक रख पायेगे......? Sunita Sharma
freelancer journalist
Uttarakhand
Tuesday, December 7, 2010
प्रश्न बहुत है ?
Thursday, October 28, 2010
मां गंगा को बचाने की तैयारियां......................।
देवनदी गंगा को बचाने के लिए उसके लाडलों में जो चेतना आयी है वह काबिले तारीफ है इसके लिए कुछ प्रयास भी किये जा रहे रहे है इन्ही प्रयासों के कुछ समाचार विभन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए।
आइये मां गंगा की अविरलता ,स्वच्छता,पवित्रता तथा उसके किनारे बसे नगरों की तरफ जो ध्यान गया है उसी से सम्बन्धित खबरों पर नजर डाले।
प्रकाशित समाचार "हिन्दुस्तान" हिन्दी समाचार पत्र
23अक्टूबर2010
प्रकाशित समाचार ,राष्टीय सहारा,28 अक्टूबर 2010
प्रकाशित समाचार,दैनिक जागरण,28 अक्टूबर 2010
दैनिक जागरण,27 अक्टूबर 2010
दैनिक जागरण 25,अक्टूबर 2010
दैनिक जागरण ,17 नवम्बर 2010
Tuesday, September 21, 2010
क्रोधित है मां.........................!
जिन घाटो पर आरती व आध्यात्म की धारा बहती थी उन घाटों पर मां गंगा का जल पूरे में अपना साम्राज्य बनाये हुए था मानो यह कहता हुआ हे पापियों अब तुम मेरे करीब रहने के मेरे जल को छुने के योगय नही रहे अब चेतो अपने कर्मो में सुधार करो नही तो मेरे जल से तुम सभी जलमग्न हो जाओगे गंगा के किनारे रहने वाले लोगो को अपनी मां के अत्यंत क्रोध का सामना करना पडा हो भी क्यो न गंगा के करीब जो तीर्थ नगरी में घटता है उसे तो मां रूष्ट होगी ही न उस जो लोग यह समझते है कितन भी पाप कर लो गंगा में स्नान करके सब धुल जायेगे वह नही जानते गंगा की शक्ति असीम है वह पापनाशिनी तो है ही जीवनदायिनी भी है पर जब वह उफन पडती है सिर्फ जीवन से ही मुक्त कर देती है......................!
आज जब सूर्यदेव आये व गंगा का उफान कुछ कम हुआ तो ने तीर्थ नगरी के लोगो के चेहरे पर.......................................................................
मुस्कान ला दी अब जिन्दगी शायद अपने राह पर चल पडेगी............... ।

Monday, June 7, 2010
गंगोत्रीतीर्थ........2
भगीरथी का तट तथा गंगामंदिरगंगोत्रीगंगात्रीतीर्थ-1 से आगे
Friday, June 4, 2010
गंगोत्तरीतीर्थ.......1

यदि हम भारत को गंगासंस्कृति का देश कहे तो कोई अतिशयोक्ति नही होगी क्योकि यहां के जनमानस में गंगा उनके जीवन का अभिन्न अंग है जन्म से मुत्यु तक उसके उपरान्त भी गंगा गंगजल प्राण से जुडा है कोई भी हिन्दु गंगाजल की उपेक्षा नही कर सकता । इसी दिव्य प्राणदेनी वाली नदी के लिए माना जाता है कि गंगोत्री में गंगा का अवतरण हुआ था। (गंगा अवतरण की कथा इस ब्लाग पर ही अन्यंत्र पढ सकते है) गंगोत्री तीर्थ ही वह जगह है जहां सर्वप्रथम गंगा का अवतरण हुआ था । हिमानी के क्रमश: पिघलते रहने पर यह उद्गम18 किमी0 पीछे गोमुख में चला गया ।Wednesday, May 26, 2010
Wednesday, April 21, 2010
गंगावतरण ....एक आलौकिक कथा- भाग चार
भगीरथ घर छोड़कर हिमालय के क्षेत्र में आए। इन्द्र की स्तुति की। इन्द्र को अपना उद्देश्य बताया। इन्द्र ने गंगा के अवतरण में अपनी असमर्थता प्रकट की। साथ ही उन्होंने सुझाया कि देवाधिदेव की स्तुति की जाए। भागीरथ ने देवाधिदेव को स्तुति से प्रसन्न किया। देवाधिदेव ने उन्हें सृष्टिकर्ता की आराधना का सुझाव दिया। क्योंकि गंगा तो उनके ही कमंडल में थी।
दिलीप के पुत्र भागीरथ ने गोकर्ण नामक तीर्थ में जाकर ब्रह्मा की कठिन तपस्या की। तपस्या करते करते कितने ही वर्ष बीत गये। ब्रह्माजी ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर गंगा जी को पृथ्वी पर लेजाने का वरदान दिया।
प्रजापति ने विष्णु आराधना का सुझाव दिया। विष्णु को भी अपनी कठिन तपस्या से भागीरथ ने प्रसन्न किया। इस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही भगीरथ के प्रयत्न से संतुष्ट हुए। और अंत में भगीरथ ने गंगा को भी संतुष्ट कर मृत्युलोक में अवतरण की सम्मति मांग ली।
विष्णु ने अपना शंख भगीरथ को दिया और कहा कि शंखध्वनि ही गंगा को पथ निर्देश करेगी। गंगा शंखध्वनि का अनुसरण करेगी। इस प्रकार शंख लेकर आगे-आगे भगीरथ चले और उनके पीछे-पीछे पतितपावनी, त्रिपथगामिनी, शुद्ध सलिल गंगा।
ब्रह्म लोक से अवतरण के समय, गंगा सुमेरू पर्वत के बीच आवद्ध हो गयी। इस समय इन्द्र ने अपना हाथी ऐरावत भगीरथ को दिया। गजराज ऐरावत ने सुमेरू पर्वत को चार भागों में विभक्त कर दिया। जिसमें गंगा की चार धाराएं प्रवाहित हुई। ये चारों धाराएं वसु, भद्रा, श्वेता और मन्दाकिनी के नाम से जानी जाती है। वसु नाम की गंगा पूर्व सागर, भद्रा नाम की गंगा उत्तर सागर, श्वेता नाम की गंगा पश्चिम सागर और मंदाकिनी नाम की गंगा अलकनन्दा के नाम से मृत्युलोक में जानी जाती है।
सुमेरू पर्वत से निकल कर गंगा कैलाश पर्वत होती हुई प्रबल वेग से पृथ्वी पर अवतरित होने लगी। वेग इतना तेज था कि वह सब कुछ बहा ले जाती। अब समस्या यह थी कि गंगाजी के वेग को पृथ्वी पर कौन संभालेगा? ब्रह्माजी ने बताया कि भूलोक में भगवान शंकर के अलावा और किसी में इस वेग को संभालने की शक्ति नही है। इसलिये गंगा का वेग संभालने के लिये भगवान शंकर से अनुग्रह किया जाये। महाराज भागीरथ ने एक अंगूठे पर खडे होकर भगवान शंकर की आराधना की। उनकी कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकरजी अपनी जटाओं में गंगाजी को संभालने के लिये तैयार हो गये। गंगा के प्रबल वेग को रोकने के लिए महादेव ने अपनी जटा में गंगा को धारण किया। इस प्रकार गंगा अपने अहंभाव के चलते बारह वर्षों तक शंकर की जटा में जकड़ी रही।
भगीरथ ने अपनी साधना के बल पर शिव को प्रसन्न कर कर गंगा को मुक्त कराया। भगवान शंकर पृथ्वी पर गंगा की धारा को अपनी जटा को चीर कर बिन्ध सरोवर में उतारा। यहां सप्त ऋषियों ने शंखध्वनि की। उनके शंखनाद से गंगा सात भागों में विभक्त हो गई। मूलधारा भगीरथ के साथ चली। महाराज भागीरथ के द्वारा गंगाजी हिमालय की घाटियों से कल कल का विनोद स्वर करतीं हुई मैदान की तरफ़ बढीं। आगे आगे भागीरथ जी और पीछे पीछे गंगाजी। यह स्थान हरिद्वार के नाम से जाना जाता है।
हरिद्वार के बाद गंगा की मूलधारा भगीरथ का अनुसरण करते हुए त्रिवेणी, प्रयागराज, वाराणसी होते हुए जह्नु मुनि के आश्रम पहुँची। भगीरथ की बाधाओं का यहां भी अंत न था। संध्या के समय भगीरथ ने वहीं विश्राम करने की सोची। परन्तु भगीरथ को अभी और परीक्षा देनी थी। संध्या की आरती के समय जह्नु मुनि के आश्रम में शंखध्वनि हुई। शंखध्वनि का अनुसरण कर गंगा जह्नु मुनि का आश्रम बहा ले गई। ऋषि क्रोधित हुए। उन्होंने अपने चुल्लु में ही भर कर गंगा का पान कर लिया। भगीरथ अश्चर्य चकित होकर रह गए। उन्होंने ऋषि की प्रार्थना शुरू कर दी। प्रार्थना के फलस्वरूप गंगा मुनि के कर्ण-विवरों से अवतरित हुई। गंगा यहां जाह्नवी के नाम से प्रसिद्ध हुई।
यह सब देख, कोतुहलवश जह्नुमुनि की कन्या पद्मा ने भी शंखध्वनि की। पद्मा वारिधारा में परिणत हो गंगा के साथ चली। मुर्शिदाबाद में घुमियान के पास भगीरथ दक्षिण मुखी हुई। गंगा की धारा पद्मा का संग छोड़ शंखध्वनि से दक्षिण मुखी हुई। पद्मा पूर्व की ओर बहते हुए वर्तमान बांग्लादेश को गई। दक्षिण गामिनी गंगा भगीरथ के साथ महामुनि कपिल के आश्रम तक पहुँची। ऋषि ने वारि को अपने मस्तक से लगाया और कहा, हे माता पतितपावनी कलि कलुष नाशिनी गंगे पतितों के उद्धार के लिए ही आपका पृथ्वी पर अवतरण हुआ है। अपने कर्मदोष के कारण ही सगर के साठ हजार पुत्र क्रोधग्नि के शिकार हुए। आप अपने पारसरूपी पवित्र जल से उन्हें मुक्ति प्रदान करें। मां वारिधारा आगे बढ़ी। भस्म प्लावित हुआ। सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार हुआ। भगीरथ का कर्मयज्ञ सम्पूर्ण हुआ। वारिधारा सागर में समाहित हुई। गंगा और सागर का यह पुण्य मिलन गंगासागर के नाम से सुप्रसिद्ध हुआ।
गंगावतरण – एक आलौकिक कथा भाग-२
श्रीमद भगवत में गंगावतरण की कथा है। प्राचीन काल की बात है। अयोध्या में इक्ष्वाकु वंश के राजा सगर राज करते थे। वे बड़े ही प्रतापी, दयालु, धर्मात्मा और प्रजा हितैषी थे।
सगर का शाब्दिक अर्थ है विष के साथ जल। हैहय वंश के कालजंघ ने सगर के पिता वाहु को एक संग्राम में पराजित कर दिया था। राज्य से हाथ धो चुके वाहु अग्नि और्व ऋषि के आश्रम चले गए।
इसी समय वाहु के किसी दुश्मन ने उनकी पत्नी को विष खिला दिया। जब उन्हें जहर दिया गया तो वो गर्भवती थी। ऋषि और्व को जब यह पता चला तो उन्होंने अपने प्रयास से वाहु की पत्नी को विषमुक्त कर जान बचा ली। इस प्रकार भ्रूण की रक्षा हुई और समय पर सगर का जन्म हुंआ। विष को गरल कहते हैं। चूकिं बालक का जन्म गरल के साथ हुआ था इस लिए वह स + गर = सगर कहलाया।
सगर के पिता वाहु का और्व ऋषि के आश्रम में ही निधन हुआ। सगर बड़े होकर काफी बलशाली और पराक्रमी हुए। उन्होंने अपने पिता का खोया हुआ राज्य वापस अपने बल और पराक्रम से जीता। इस प्रकार सगर ने हैहयों को जीत कर अपने पिता की हार का बदला लिया।
ऋषि अग्नि अर्व हैहयों के परंपरागत शत्रु थे। उन्होंने भी सगर को हैहयों के विरूद्ध संग्राम में हर प्रकार की सहायता प्रदान की। सगर की दो पत्नियां थी वैदर्भी और शैव्या। राजा सगर ने कैलाश पर्वत पर दोनों रानियों के साथ जाकर भगवान शंकर की कठिन तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे कहा कि तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी आराधना की है। अतएव मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि तुम्हारी एक रानी के साठ हजार पुत्र होंगे किन्तु दूसरी रानी से तुम्हारा वंश चलाने वाला एक ही सन्तान होगा।
वैदभी के गर्भ से मात्र एक पुत्र था उसका नाम था असमंज। वे बड़े दुष्ट और प्रजा को दुख पहुंचाने वाले थे। जबकि सगर अत्यंत ही धार्मिक सहिष्णु और उदार थे। सगर के लिए असमंज का व्यवहार बड़ा ही दुख देने वाला था। जब उसकी आदतें नहीं सुधरी तो सगर ने असमंज को त्याग दिया।
असमंज के औरस से अंशुमान का जन्म हुआ। वह बहुत ही पराक्रमी था। अंशुमान ने अश्वमेघ और राजसूय यज्ञ सम्पन्न कराया और राजर्षि की उपाधि प्राप्त की।
शैव्या के गर्भ से साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए। सभी काफी वीर और पराक्रमी थे। उनके ही बल पर सगर ने मध्यभारत में एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।
सगर न सिर्फ बहुबली और पराक्रमी थे, बल्कि धार्मिक प्रकृति के व्यक्ति भी थे। वे ऋषियों महर्षियों का काफी आदर सत्कार और सम्मान किया करते थे। वशिष्ठ मुनि ने सगर को सलाह दी की अश्वमेघ यज्ञ का अनुष्ठान करें ताकि उनके साम्राज्य का विस्तार हो।
ऐसी मान्यता है कि प्राचीन काल में किए जाने वाले यज्ञानुष्ठानों में अश्वमेघ यज्ञ और राजसूय यज्ञ सर्वश्रेष्ठ थे। उन दिनों बड़े व प्रतापी और पराक्रमी सम्राट ही अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन करते थे। इस यज्ञ में 99 यज्ञ सम्पन्न होने पर एक बहुत अच्छे गुणों वाले घोड़े पर जयपत्र बांध कर छोड़ दिया जाता था। उस पत्र पर लिखा होता था कि घोड़ा जिस जगह से गुजरेगा वह राज्य यज्ञ करने वाले राजा के अधीन माना जाएगा। जो राजा या जगह स्वामी अधीनता स्वीकार नहीं करते थे, वे उस घोड़े को रोक लेते थे और युद्ध करते थे।
घोड़े के साथ हजारों सैनिक साथ साथ चलते थे। एक वर्ष पूरा होने पर घोड़ा वापस लौट आता था। इसके बाद उसकी बलि देकर यज्ञ पूर्ण होता था। महाराजा सगर ने अपने यज्ञ के घोड़े श्यामकर्ण की सुरक्षा के लिए हजारो सैनिकों की व्यवस्था की थी। वीर बाहुबलि सैनिक घोडे़ के साथ निकले, और आगे बढ़ते रहे। सगर का प्रताप चतुर्दिक फैल रहा था। जगह जगह उनके बल-पराक्रम और शौर्य की चर्चा होने लगी।
इससे देवराज इन्द्र को शंका हुई। सगर के इस अश्वमेघ यज्ञ से भयभीत होकर इन्द्र यह सोचने लगे कि अगर यह अश्वमेघ यज्ञ सफल हो गया तो यज्ञ करने वाले को स्वर्गलोक का राजपाट मिल जाएगा। इन्द्र ने यज्ञ के घोड़े को अपने मायाजाल के बल पर चुरा लिया। इतना ही नहीं उन्होंने इस घोड़े को पाताललोक में तपस्यारत महामुनि कपिल के आश्रम में छिपा दिया। उस समय मुनि गहन साधना में लीन थे। फलतः उन्हें पता ही नहीं लगा कि क्या हो रहा है?
एक साल पूरा होने को जब आया तो घोड़ा न लौटा सगर चिन्तित हो उठे। राजा सगर ने अपने साठ हजार पुत्रों को यज्ञ के घोड़े की खोज कर लाने का आदेश दिया। ये पुत्र यज्ञ के घोड़े की खोज में निकल पड़े।
प्रस्तुतकर्ता- मनोज कुमार
Tuesday, April 20, 2010
गंगावतरण - एक आलौकिक कथा भाग-एक
सर्वत्र पावनी गंगा त्रिषु स्थानेषु दुर्लभा।
गंगा द्वारे, प्रयागे च गंगासागर संगमे॥
गंगासागर की यात्रा की चर्चा के क्रम में हमने आपका सागर द्वीप से परिचय कराया था। हमारे लिये गंगा मात्र एक नदी ही नहीं, हमारे देश की आत्मा है। हमारे देश की सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक है। हम तो उसे अपने देश की अस्मिता के साथ जोड़कर देखते हैं। भारत की राष्ट्र-नदी गंगा जीवन ही नहीं, अपितु मानवीय चेतना को भी प्रवाहित करती है। ग्रंथों में गंगा का वर्णन अनेक रूपों में मिलता है। भगीरथनंदिनी, विष्णुपदसरोजजा और जाह्न्वी के रूप में गंगा नर-नागों, देवताओं और ऋषिओं मुनियों के लिए वंदनीय है। गंगा के उद्भव (विष्णुपद), वास (ब्रह्म कमण्डल), विकास (भगीरथ नंदिनी), प्रवाह(जाह्न्वी) एवं प्रभाव (कल्पथालिका) का वर्णन है।
गंगा नदी के महत्व को सभी स्वीकार करते हैं; क्योंकि गंगा किसी में कोई भेद नहीं करती है। सभी को एक सूत्र में पिरोती है और एक सूत्र में बाँधे रखने का संकल्प प्रदान करती है गंगा।
हम उसे मां कहते हैं – गंगा मैय्या! गंगा जीवन तत्त्व है, जीवन प्रदायिनी है, इसीलिए माँ है। तभी तो उसे पवित्रतम नदी की संज्ञा देते हैं। गंगा को पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित् श्रेष्ठा एवं महानदी कहा गया है। आज उस नदी की जीवन्तता पर प्रदूषण से बहुत बड़ा खतरा मंडरा रहा है। हम उसके विनाश का कारण न बनें। कितनी मुश्किलों से हमारे पूर्वजों ने गंगा को पृथ्वी पर लाया।
गंगा का पृथ्वी पर अवतरण की अनेक कथाएं प्रचलित हैं। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार गंगा को लक्ष्मी और सरस्वती के साथ विष्णु की पत्नी मना गया है। ऐसा बताया गया है कि आपसी कलह और शत्रुता के कारण ये तीनों मृत्युलोक में नदी के रूप में चली आईं। ये तीन नदियां हैं – गंगा, पद्मा और सरस्वती।
एक अन्य कहानी के अनुसार गंगा के पृथ्वी पर अवतरण में नारद जी का हाथ है। कहा गया है कि महर्षि नारद को अपने संगीत के ज्ञान पर काफ़ी घमंड था। उनको लगता था कि उनके जैसा पहुंचा हुआ संगीतज्ञ कोई और नहीं है। घमंड में चूर वो संगीत का उलटा-पुलटा अभ्यास करते थे। न राग का ख़्याल था उन्हें न रागिनियों का। पूरा संगीत शास्त्र ही उन्होंने विकृत कर रखा था।
उनके इस व्यवहार से राग-रागिनियां अत्यंत दुखी हो गयीं। उन्होंने अपने विचार नारद मुनि को बताया। पर नारद तो घमंड में चूर थे। उन्हें लगता कि वे जो भी कर रहे हैं सब ठीक है। अपनी ग़लती वो पकड़ ही नहीं पा रहे थे। संगीत का समान्य ज्ञान था नारद के पास। पर उतने पर ही वे अहंकारी हो गये थे। अपने अल्प ज्ञान पर किसी को अहंकारी नहीं होना चाहिए। बल्कि उसे तो और अधिक ज्ञान प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए। संगीत साधना कोई छोटी-मोटी साधना नहीं है। इसे नादब्रह्म कहा गया है। संगीत साधना हो या अन्य कोई साधना – हमें सदैव अहंकार से दूर रहना चाहिए। सधना में जितनी विनम्रता होगी हम उतना ही अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे। अहंकार से तो नाश ही होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं नारद, जिनके जैसे साधक को भी पतन का सामना करना पड़ा।
इधर राग-रागिनियां नारद के अहंकारी स्वभाव के चलते विकलांग होती गयी थीं। यह ख़बर देवताओं तक पहुंची। तब यह निश्चय हुआ कि यदि देवाधिदेव महादेव संगीताभ्यास करें तो राग-रागिनियां सामान्य हो सकेंगी। महादेव राज़ी हो गये। वो देवसभा में राग-रागिनियों के कल्याण हेतु गा रहे थे। पर उनके संगीत का स्तर काफ़ी शास्त्रीय था, उच्च था। उनके इस रस-गांभीर्य को समझने की क्षमता किसमें थी?! कुछ हद तक विष्णु की समझ में आ रहा था। पुराण में यह वर्णित है कि महादेव के गायन से जो संगीत-लहरी उठी उससे विष्णु भगवान के पैर का अंगुठा गल कर जल बन गया। और उस जल से पूरा देवलोक प्लावित हो गया। इस द्रव को ब्रह्मा जी ने अत्यंत सावधानी के साथ, अपने कमंडल में भरकर रख लिया। इसी जल को, जो ब्रह्मा के कमंडल में था, भगीरथ अपनी अथक तपस्या के बल पर पृथ्वी पर लाए ताकि सगर के पुत्रों का कल्याण हो सके। चूंकि यह जल विष्णु के पैर के विगलित होने से बना था, इसी कारण से गंगा का एक नाम विष्णुपदी भी है। विष्णुपदी गंगे सभी लोकों को पवित्र करने वाली, अघ ओघ की बेड़ियों को काटने वाली, पतितों का उद्धार करने वाली तथा दुःखों को विदीर्ण करने वाली है।.......
जारी है अगले अंक में गंगावतरण की दिव्य कथा
प्रस्तुतकर्ता -मनोज कुमार
Featured Post
यहां वीरभद्र प्रकट हुआ था ----- वीरभद्रेश्वर मंदिर (ऋषिकेश)
पिछली पोस्ट में मैने ऋषिकेश के वीरभ्रद्र क्षेत्र का इतिहास बताया था पर इस पोस्ट में यह बता दू कि क्यो इस क्षेत्र को वीरभद्र के नाम से जाना ...
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भगीरथ घर छोड़कर हिमालय के क्षेत्र में आए। इन्द्र की स्तुति की। इन्द्र को अपना उद्देश्य बताया। इन्द्र ने गंगा के अवतरण में अपनी असमर्थता...
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आदिकाल से बहती आ रही हमारी पाप विमोचिनी गंगा अपने उद्गम गंगोत्री से भागीरथी रूप में आरंभ होती है। यह महाशक्तिशाली नदी देवप्रयाग में अलकनंदा ...
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बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे ! हम भी कुंभ नहा आए ! हरिद्वार के हर की पौड़ी में डुबकी लगाना जीवन का सबसे अहम अनुभव था। आप इसे...
























