Monday, June 7, 2010

गंगोत्रीतीर्थ........2

भगीरथी का तट तथा गंगामंदिरगंगोत्री
गंगात्रीतीर्थ-1 से आगे

गंगोत्री तीर्थ में भगीरथी के अनुरोध से गंगा अवतरित हई गंगाअवतरण की कथा के लिए पढे, सारे तीर्थ बार-बार गंगासागर एक बार । पर्वतों से घिरे भारी शिलाखंडो व धरातलीय स्थिति के कारण जब तक गंगोत्तरी के निकट नही पंहुचा जाता तब तक इस तीर्थ की स्थिति का पता ही चल पाता रास्ते तमाम बाधाओ को पार कर जब तीर्थ यात्री,श्रद्वालु एंव पर्यटक गंगोत्री पहुंचते है तो यहां के सुन्दर प्राकृतिक दृशय देख सारी थकान भृल जात है और पंहुच जाते है गंगा के करीब उसके उदृगम के आस-पास यह सोच कर भी रोंमाच से भर उठते है कि यही वह जगह है जहां जीवनदायिनी मां गंगा धरती पर आयी उत्तरवाहिनी बनी व इस जगह को गंगात्री का कहा गया ।
प्राचीन काल में इस स्थान में कोई मंदिर नही था केवल भागीरथी शिला के पास चौतरा था जिसमें देवीमूर्ति को यात्राकाल के 3-4 मास दर्शनार्थ रखा जाता था ।तब इस मूर्ति को उत्सव समारोह के साथ यात्राकाल के प्रारम्भ में अनेक बदलते रहते मठस्थान ,क्रमश:शयामप्रयाग ,गंगामंदिर धराली या मुखवा ग्राम ये लाया जाता था तथा यात्राकाल की समाप्ति पर यही वापस ल जाया भी जाता था । यह प्रथा उत्तराखण्ड के अन्य तीर्थो में भी थी और इस प्रकार प्रत्येक तीर्थ देवता के ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन आवास पृथक होते थे यह प्रथा जारी है । यमनोत्री व गंगोत्री तीर्थो की यह विशेषता भी रही कि यहां मंदिर बनाना उचित नही समझा गया कारण यह भी कि जहां स्वयं देवी माता साक्षात स्वरूप में विघमान है और भक्तों तथा पापियों का उद्वार करने के लिए कुण्ड की अथवा प्रवाह रूप में सुलभ है वहां मुर्ति रखने की क्या आवश्यकता है ?
वेदव्यास ने बह्रम की अराधना को प्रकृति के खुले प्रांगण में करने को ही सर्वोपरि बताया था व नदियों को विश्वमाता बताते हुए घोषित किया था कि "विश्वस्य मातर:सर्वश:चैव महाफला।"फ्रेजर को उन्नीसवीं शती ई0 के प्रारम्भ में मिली जानकारी पूर्ण ऐतिहासिक थी , कि पहले यहां कोई मंदिर नही था। रीपर द्वारा भेजे गये पंडित ने 1808 ई0 में जो सुचना दी थी उसके अनुसार मंदिर पत्थर और लकडी का बना था।
उन्नीसवीं शती के मध्य में पुन: वहां एक प्रकृति प्रेमी एमा रार्बट का खोजी दल पंहुचा वहां के मनोरम दृशय का तुलिका से चित्रण करने के उपरान्त यह संक्षिप्त सूचना भी दी कि भागीरथी धारा से 20 फूट उचाई पर एक चटटान के उपर एक गोरखा सामन्त ने अपनी विजय के प्रतीकार्थ यहां देवी के सम्मान में यह छोटा पगौडा शैली का मंदिर बनवाया था और उन ब्राहृमणों को इसके निकट आवास दिया थां। भारत के विभिन्न भागों को जाने वाले गंगाजल पर यहां पवित्रता की मुहर लगायी जाती है।मंदिर का र्निमाण किसने करवाया इस बारे में एक राय नही है ............शेष आगे, अभी जारी है

No comments: