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Sunday, January 6, 2013

इलाहाबाद (प्रयाग) महाकुम्भ.. ......2013

इलाहाबाद (प्रयाग) लगभग 65 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है तथा उत्तरप्रदेश राज्य में 25.3 उत्तरी अक्षांश व 8155 पुर्वी देशांश पर स्थित है । दिल्ली से इसकी दुरी 612 कि.मी. है और मुबई से 1502कि.मी. । यह भारत का प्राचीनतम शहर है बसा है गंगा ,यमुना और पौराणिक सरस्वती नदी के संगम पर । हिन्दुओ का अति पवित्र ऎतिहासिक नगर इलाहाबाद पहले प्रयाग के नाम से विख्यात था, स्कन्द पुराण के अनुसार सृष्टि की रचना के लिए ब्रह्रमा जी ने यज्ञ आयोजित करने के लिए गंगा ,यमुना और सरस्वती द्वारा घिरे हुए एक प्रमुख भू-खण्ड का चयन किया जो बाद में प्रयाग के नाम से जाना गया ।सागर मंथन के उपरान्त  देवताओ व असुरों के अमृत प्राप्ति के लिए हुए झगडे में अमृत कलश से  कुछ बूंदे यहां भी गिर गयी तभी से यह स्थान तीर्थराज  के नाम से भी जाना जाता है ।
इलाहाबाद प्रयाग का अपना एक स्वर्णिम इतिहास है अयोध्या से निष्कासन के बाद भगवान राम ने भी यहां कुछ समय व्यतीत किया ।  1584 में मुगल बादशाह अकबर ने त्रिवेणी संगम पर एक प्रतापी संग्रामिक किले का निर्माण किया इस स्थान का अल्लाहबास अथवा इलाहाबाद नाम पड गया । 

कुम्भ मेला एक नित्य नवीन उत्सव है कुम्भ मेला भारत के अन्य तीन स्थानों पर होता है हरि़द्वार में गंगा तट पर ,उज्जैन में क्षिप्रा नदी के तट पर तथा नासकि में गोदावरी के तट पर ग्रहों के प्रभाव से कुछ विशिष्ट समयों पर समुद्र मंथन द्वारा प्राप्त अमृत इन नदियों में पुन: प्रकट होता है और इन नदियों का जल आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न हो जाता है । इस समय इन नदियों में स्नान करने से मुक्ति प्राप्त होती है ।
वर्ष 2001 में कुम्भ मेला यहां 44 दिनों के लिए था जबकि कुम्भ 2013......कुल  55 दिनों के लिए होगा । इस दौरान इलाहाबाद  प्रयाग सर्वाधिक आबादी वाला शहर बन जाता है ।   

कुम्भ 2013 के पमुख स्नान ।

मकर संक्राति ........14.1.2013.............शाही स्नान 

पौष पूर्णिमा...........  27.1.2013

मौनी अमावस्या.......10.2.2013.............शाही स्नान 

बसन्त पंचमी...........15.2.2013 .............शाही स्नान

माघी पूर्णिमा .......... 25.2.2013

महाशिवरात्रि........... 10.3.2013

Sunday, June 20, 2010

गंगोत्रीतीर्थ........अन्तिम भाग


पिछले दो भागो में आपने गंगोत्रीतीर्थ व यहां के मंदिर के बारे में जाना अब आगे........1816 में जब फ्रेजर ने नया विवरण प्रस्तुत किया तो गंगोत्री का पंडित व उसक परिवार के सदस्यों का मुखवा ग्राम में रहने का उल्लेख मिलता है यह भी पता चलता है कि 1788ई0 में गंगोत्तरी का मठ उजडा हुआ था जिससे यह तथ्य भी ध्यान में आता है कि मंदिर का निर्माण इस तिथि से पहले हो चुका था संभवत पहले वहां लकडी का मंदिर था उत्तराखण्ड के मंदिरों के इतिहास के बारे में लिखी गयी पुस्तकों से भी ज्ञात होता है कि अमरसिंह थापा ने मुखवा -गंगोत्तरी का कीमति प्रदेश गूंठ में दिया था ।गंगोत्री का वर्तमान मंदिर बनाने का श्रेय बीसवी शती ई0  के प्रारम्भ में जयपुर नरेश माधोसिहं  को दिया जाता है मंदिर के गवाक्ष राजस्थानी शैली के तथा बरामदें के स्तम्भ राजस्थानी पहाडी शैली के मिश्रित स्वरूप में बने है ,गर्भगृह में गंगा की आभुषण युक्त मूर्ति है।गंगा मंदिर के समीप ही भैरव मंदिर भी है।


-गंगा माता मंदिर








गंगोत्री एक खुबसुरत शहर है सर्दियों में यह बर्फ से ढका रहता है विदेशी इसे बहुत पसन्द करते है विदेशियों में यह ट्रेंकिग के लिए भी लोकप्रिय है गौमुख व उससे आगे भी ट्रेकिग  पर जाते है । तीर्थ यात्रा के अलावा यह एक प्रमुख पर्यटक स्थल है   यह शहर दो भागों में बटा है भागीरथी के दोनो किनारों पर बसा है ।
1808 में जब गंगा स्रोत की खोज का कार्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के सर्वेयर  जनरल के  आदेश पर कैप्टन रीपर तथा ले0 वेब को सौपा गया था । रीपर ने तब भटवाडी तक यात्रा की थी परन्तु वकिट मार्ग होने के कारण आगे नही बढ पाया वह लिखता है कि हिन्दु धर्म में गंगोत्री की यात्रा एक महान कार्य बतायी जाती है,1816 में उत्तराखण्ड पर ईस्ट इंडिया कम्पनी का अधिपत्य होते समय हिमाचल जौनसार ,यमुनोत्री होते हुए गंगोत्री पहुंचा था उसने द हिमाला माउन्टेन पृ0479 में लिखा -- "हम इस समय विशव के विलक्षण हिमाला के मध्य में शायद सर्वाधिक उबड-खाबड गिरि श्रृंगो के मध्य में खडे भारत की पवित्रतम नदी को निहार रहे थे ।हिमालय के तीर्थो में सर्वाधिक पवित्र इस तीर्थ की विराट नीरवता,स्तब्धता और एकान्तिकता हमारे मस्तिष्क  में अवर्णीय अनूभूति का संचार कर रही थी ।"
गंगोत्री मंदिर के निकट ही भागीरथी एक फलांग आगे पश्चिम दिशा में विशाल  में चट्टानों को चीरती हई एक चट्टानी गर्त में भंयकर वेग व गर्जना से प्रताप बनाती हुई  गिरती है । इस गौरी कुण्ड कहते है ।
भागीरथी शिला से नीचे नहाने के लिए गर्म जल का प्राकृतिक स्रोत है जिसे ब्रहमकुण्ड कहा जाता है।   
प्राकृतिक दृशयों से भरपुर गंगोत्री यात्रा का अलग ही रोमांच है भागीरथी शिला ,सुरजकुण्ड भी देखने  लायक है। यदि पैदल यात्रा का शौक रखते हो तो गौमुख जाना न भूले यात्रा मार्ग के लिए घोडे व खच्चर भी उपलब्ध रहते है । 
                                                                                                               गौरीकुण्ड-






सुरजकुण्ड-










             

Monday, June 7, 2010

गंगोत्रीतीर्थ........2

भगीरथी का तट तथा गंगामंदिरगंगोत्री
गंगात्रीतीर्थ-1 से आगे

गंगोत्री तीर्थ में भगीरथी के अनुरोध से गंगा अवतरित हई गंगाअवतरण की कथा के लिए पढे, सारे तीर्थ बार-बार गंगासागर एक बार । पर्वतों से घिरे भारी शिलाखंडो व धरातलीय स्थिति के कारण जब तक गंगोत्तरी के निकट नही पंहुचा जाता तब तक इस तीर्थ की स्थिति का पता ही चल पाता रास्ते तमाम बाधाओ को पार कर जब तीर्थ यात्री,श्रद्वालु एंव पर्यटक गंगोत्री पहुंचते है तो यहां के सुन्दर प्राकृतिक दृशय देख सारी थकान भृल जात है और पंहुच जाते है गंगा के करीब उसके उदृगम के आस-पास यह सोच कर भी रोंमाच से भर उठते है कि यही वह जगह है जहां जीवनदायिनी मां गंगा धरती पर आयी उत्तरवाहिनी बनी व इस जगह को गंगात्री का कहा गया ।
प्राचीन काल में इस स्थान में कोई मंदिर नही था केवल भागीरथी शिला के पास चौतरा था जिसमें देवीमूर्ति को यात्राकाल के 3-4 मास दर्शनार्थ रखा जाता था ।तब इस मूर्ति को उत्सव समारोह के साथ यात्राकाल के प्रारम्भ में अनेक बदलते रहते मठस्थान ,क्रमश:शयामप्रयाग ,गंगामंदिर धराली या मुखवा ग्राम ये लाया जाता था तथा यात्राकाल की समाप्ति पर यही वापस ल जाया भी जाता था । यह प्रथा उत्तराखण्ड के अन्य तीर्थो में भी थी और इस प्रकार प्रत्येक तीर्थ देवता के ग्रीष्मकालीन और शीतकालीन आवास पृथक होते थे यह प्रथा जारी है । यमनोत्री व गंगोत्री तीर्थो की यह विशेषता भी रही कि यहां मंदिर बनाना उचित नही समझा गया कारण यह भी कि जहां स्वयं देवी माता साक्षात स्वरूप में विघमान है और भक्तों तथा पापियों का उद्वार करने के लिए कुण्ड की अथवा प्रवाह रूप में सुलभ है वहां मुर्ति रखने की क्या आवश्यकता है ?
वेदव्यास ने बह्रम की अराधना को प्रकृति के खुले प्रांगण में करने को ही सर्वोपरि बताया था व नदियों को विश्वमाता बताते हुए घोषित किया था कि "विश्वस्य मातर:सर्वश:चैव महाफला।"फ्रेजर को उन्नीसवीं शती ई0 के प्रारम्भ में मिली जानकारी पूर्ण ऐतिहासिक थी , कि पहले यहां कोई मंदिर नही था। रीपर द्वारा भेजे गये पंडित ने 1808 ई0 में जो सुचना दी थी उसके अनुसार मंदिर पत्थर और लकडी का बना था।
उन्नीसवीं शती के मध्य में पुन: वहां एक प्रकृति प्रेमी एमा रार्बट का खोजी दल पंहुचा वहां के मनोरम दृशय का तुलिका से चित्रण करने के उपरान्त यह संक्षिप्त सूचना भी दी कि भागीरथी धारा से 20 फूट उचाई पर एक चटटान के उपर एक गोरखा सामन्त ने अपनी विजय के प्रतीकार्थ यहां देवी के सम्मान में यह छोटा पगौडा शैली का मंदिर बनवाया था और उन ब्राहृमणों को इसके निकट आवास दिया थां। भारत के विभिन्न भागों को जाने वाले गंगाजल पर यहां पवित्रता की मुहर लगायी जाती है।मंदिर का र्निमाण किसने करवाया इस बारे में एक राय नही है ............शेष आगे, अभी जारी है

Friday, April 9, 2010

सारे तीर्थ बार बार गंगा सागर एक बार

आदिकाल से बहती आ रही हमारी पाप विमोचिनी गंगा अपने उद्गम गंगोत्री से भागीरथी रूप में आरंभ होती है। यह महाशक्तिशाली नदी देवप्रयाग में अलकनंदा से संगम के बाद गंगा के रूप में पहचानी जाती है। लगभग 300 किलोमीटर तक नटखट बालिका की तरह अठखलियां करती, गंगा तीर्थनगरी हरिद्वार पहुंचती है। तीर्थनगरी में कुंभस्‍नान तो हम पिछले महीने कर आए थे। अब घर के सदस्‍यों का विचार हुआ गंगा का सागर से संगम भी हो आया जाय। हर साल मकर सक्रांति पर्व पर महाकुंभ जैसा पर्व यहां लगता है। तीर्थस्‍थल गंगासागर श्रेष्‍ठ तीर्थ क्षेत्र है। पहले यहां आने जाने की सुविधा उतनी नहीं थी। अतः यह लोकोक्ति प्रचलित हो गई।

सारे तीर्थ बार बार |

गंगा सागर एक बार||

यह तीर्थ एक समय अत्‍यंत दुर्गम था। उस समय यंत्र चालित नाव नहीं थी। बिजली, पानी, आश्रम एवं परिवहन संवा का अभाव था। आज ऐसी बात नहीं है। पथ की वह दुर्गमता अब नहीं रही। यातायात के अनेक साधन का विकास हुआ है। जिससे यात्रा सहज हो गई है। इस जनविरल तीर्थ में अनेक आश्रम स्‍थापित हो चुके हैं पक्‍के रास्‍तों का निर्माण बसों का आवागमन आदि आंरभ हो चुका है।

अब तो यातायात के कई साधन हो चुके हैं। कोलकाता से गासागर जाने की सड़क भी काफी अच्‍छी और चौड़ी है। सरकारी व गैर सरकारी बस के द्वारा लट नम्‍बर 8 तक पहूँचा जा सकता है। हमने तो अपनी गाड़ी से ही यात्रा आरंभ की। कोलकाता से लट नं 8 तक की दूरी लगभग 100 किलोमीटर की है। बीच में लगभग 40 किलोमीटर की दूरी तय करने पर डायमंड हारबर आता है। यहां पर सड़के के किनारे गंगा का फैलाव एवं दृश्‍य बड़ा ही मनोरम है। गाड़ी से उतर कुछ देर यहां का आनंद लिया फिर आगे की यात्रा पर निकल पड़े

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डायमंड हारबर

लट नं; 8 तक पहूँचने में लग्‍भग दो घंटे लगे। यहां से जलयान द्वारा कचुबेडि़या द्वीप के लिए जाया जाता है। यह दूरी लगभग 8 किलोमीटर की है और जलयान द्वारा इसे तय करने में 25 से 30 मिनट लगते हैं। सुबह छह बजे से ही जलयान या फेरी सेवा शुरू हो जाती है, जो रात के नौ बजे तक चलती रहती है।

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कहते हैं कि पहले कोचुबेडि़या द्वीप और घोड़ामारा द्वीप एक था बाद में जल के कटाव से दोनों अलग हो गए।

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बंगाल के सुदूर दक्षिणी छोर पर विश्‍वविख्‍यात सुंदरवन है। सागर द्वीप उसी सुन्दर वन का एक महत्‍वपूर्ण भाग है। यह द्वीप 30 किलोमीटर लम्‍बा और औसत 10-12 किलोमीटर चौडा है। यह लगभग 5000 वर्ष पुराना है। यह दक्षिण 24 परगना जिले में आता है। कोचुबेडि़या से गंगासागर तट तक दूरी 30 किलोमीटर है और यहां बस, ट्रेकर अथवा प्राइवेट गाड़ी से जाया जा सकता है। हमने यह यात्रा टाटा सूमो से तय की। रास्‍ता काफी अच्‍छा है।

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तट पर का मनोरम दृश्‍य देख कर हम तो अत्‍यंत प्रसन्‍नचित हुए। जलनिधि का किल्‍लोल, रूपहले बालू कण और महामुनि कपिल का प्राचीन मन्दिर।

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गंगासागर की छवि की छटा निराली है। ऊपर नील गगन का विस्‍तार, नीचे श्‍वेत, फेनिल जलधि तरंगे, और धरा पर रजत बालूका कणों का फैलाव ऊपर से सूरज की सुनहली किरणें – इस स्‍थल की शोभा को असीमित विस्तार देते हैं। दक्षिण की ओर फेनिल समुद्र है समुद्र की उत्ताल लहरें दूर दूर तक शुभ्र वालुकामय सुविस्‍तृत स्‍थलखण्‍ड का विस्‍तार है। चारो ओर फैले हुए हरे भरे बन इसकी शोभा में चार चांद लगाते हैं। चारो ओर प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्‍छादित है गंगासागर की पुण्‍यभूमि।

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गंगासागर पाताल (अर्थात नदी और समुद्र से घिरा जल-जंगल परिपूर्ण निम्‍नभूमि क्षेत्र) लोक के अंतिम छोर पर है जहां भगवान विष्‍णु के पांचवे अवतार महा‍मुनि कपिल का प्रादुर्भाव हुआ। ऐसा माना जाता है कि कपिल मुनि महर्षि कर्दम और मनुकन्या देवहुति के यहां पुत्र रूप में अवतरित हुए। कपिलमुनि के उपदेश सांख्‍यदर्शन के रूप में जगत विख्‍यात है। संसार की सृष्टि व जीवात्‍मा का गूढ़ रहस्‍य का तत्‍व उस दर्शन में दिया गया है। इसके बारे में विस्‍तार से फिर कभी।

यहां पर कपिल मुनि का आश्रम है। परंपराओं की माने तो महामुनि कपिल का आश्रम सागर और गंगा के मिलन के पहले से ही प्रतिष्ठित था। पर बारम्‍बार समुद्र द्वारा ग्रास किए जाने के कारण अपना स्‍थान बदलता रहा। हालांकि ईसा के 437 वर्ष पूर्व यहां पर एक प्राचीन मंदिर के अस्तित्‍व की चर्चा मिलती है , पर वह मंदिर सागर के गर्भ में समा गया। वर्तमान अवस्थित मंदिर का निर्माण सन 1974 हमें हुआ। यह सांतवां मंदिर है।

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श्री गंगासागर संगम प्रवाह में गोता लगाकर और सिद्धेश्‍वर श्री कपिलमुनि का भाव भरे नेत्रों से दर्शन और अनुराग भरे हृदय से अर्चन वन्‍दन और आत्‍मनिवेदन कर हमने अपने मानव जीवन को कृतार्थ किया।

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इस मंदिर में कई विग्रह है। कपिल मुनि पद्मासन में अपने आसन पर आरूढ़ है। उनका श्रीमुख जटाओं से मंडिंत है। उनके बांए हाथ में कमण्‍डल है। दाहिने हाथ में जपमाला। शीर्ष भाग में बने पंचनाग छत्‍त्रवत् उनपर छाया करते हैं। यह मूर्ति हमें संदेश देती है कि अगर कैवल्‍य या मुक्ति की कामना करते हो तो जप, तप, अराधना में लीन रहो। भगवान कपिल के दाहिने भाग में मां गंगा की मुर्ति है। ये चतुर्भुजा और मकरवाहिनी है। इनके हाथ शंख, चक्र, रत्‍नकुंभ एवं वरमुद्रा है। देवी के अंक में महातपस्‍वी भगीरथ विद्यमान है। देवी गंगा से कुछ दूरी पर विराजमान है हनुमान जी, जिनके एक हाथ में गदा और दूसरे में गंदमादन पर्वत है। कपिलदेवके बाएं में राजा सगर है। इनके बाएं में अष्‍टभुजा सिंहारूढ देवी विशालाक्षी अधिष्ठित है। मां के करकमलों में त्रिशुल, खड्ग चक्र आदि आयुध और कमल पुष्‍प हैं। इनके बाई ओर इन्‍द्रदेव है जिनके दाहिने हाथ में धनुष, बाएं में यज्ञ के अश्‍व की वल्‍गा एवं बाएं स्‍कन्‍ध में तरकस है। इन्‍द्रदेव के बगल में देवाधिदेव महादेव है। साथ ही राधा-कृष्‍ण के युगल की मूर्ति भी है। सभी मूर्तियां सिन्‍दूर से मण्डित हैं। प्रतिदिन पांच बार मंदिर में पूजा होती है। रात 2 ½ बजे मंगल आरती और 4 बजे श्रृंगार आरती, दोपहर 2 बजे भोग आरती, संध्‍या 7 बजे संध्‍या आरती एवं रात 8 ½ बजे शयन आरती|

गंगा सागर आज नित्‍यतीर्थ बन चुका है। फिर भी मकर सक्रांति के अवसर पर गंगा सागर तीर्थस्‍थान परम पुण्‍यादायक है। त्रिपथगामिनी (त्रिपथ अर्थात इड़ा, पिंगला, सुषुम्‍ना ग्रंथियों) गंगा भगीरथ के अभूतपूर्व तपस्‍या से इहलोक में अवतीर्ण हुई जो मानवमात्र के लिए मुक्तिप्रदायिणी व कल्‍याणकारी है। गंगा के पृथ्‍वी पर आने की अनेक कथाएं प्रचलित है। इसमें एक है राजा सगर के साठ हजार पुत्रों की महामुनि कपिल की क्रोधग्नि से जलकर भस्मिभूत हो जाना और सगर के पौत्र अंशुमान द्वारा भगीरथ के अक्‍लान्‍त परिश्रम और चेष्‍टा के बाद उनका उद्धार करने की प्रक्रिया में गंगा का पृथ्‍वी पर लाया जाना। इसकी भी विस्‍तृत चर्चा फिर कभी।

आज तो यही कहूँगा कि त्रिपथगामिनी स्‍वर्ग से मंदाकिनी, पाताल से भगवती और जो धारा मर्त से अवतीर्ण हुई वह भगीरथ द्वारा आनयन होने के कारण भागीरथ नाम से आख्‍यात, त्रिलोकपावनी गंगा का नाम स्‍मरण करने में समस्‍त पाप कट जाते हैं। जिनके दर्शन और स्‍थान से सप्‍तकुल पवित्र हो जाते हैं। गंगासागर तीर्थ की महिमा अपरिसीम और अनिर्वचनीय है।

इन धार्मिक आध्‍यात्मिक बातों के अलावा गंगा भारतवर्ष की चेतना, दर्शन और संस्‍कृति की धरोहर है। इसके तट पर न सिर्फ ऋषि, मुनि, साधक, तपस्‍वी अपनी साधना के चरम शिखर पर पहुंच कर सिद्धि प्राप्‍त किए बल्कि इसके तटभूमि में अनन्‍त याय योज्ञ शास्‍त्र पाठ, पुष्‍यानुष्‍ठान का आयोजन होते रहा है।

सागरद्वीप ब्रहम्‍पुत्र के डेल्‍टा के दक्षिण-पश्चिम छोर पर है। इस का क्षेत्रफल 205 वर्ग किमी है। इसके 9 ग्रामपंचायत है। 2001 की जनगणना के आधार पर यहां की जनसंख्‍या 1,85,630 थी। यहां पर एक महाविद्यालय, 6 उच्‍च माध्‍यमिक विद्यालय, 13 माध्‍यमिक विद्यालय, 12 निम्‍न माध्‍यमिक विद्यालय, 123 प्राथमिक विद्यालय, 16 गैरसरकारी के.जी एवं नर्सरी स्‍कूल, 63 शिशु केंद्र है। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि स्‍थानीय सरकार यहां पर शिक्षा के प्रति कितनी सजग है। इसका परिणाम है कि यहां की साक्षरता 90 प्रतिशत से भी अधिक है। स्‍वास्‍थ्य के प्रति भी इस जनविरल क्षेत्र में काफी जागरूकता दिखी। यहां एक ग्रामीण अस्‍पताल, प्राथमिक स्‍वास्‍थ्य केंद्र एवं 35 उप स्‍वास्‍थ्‍य केंद्र हे। पेय जल की भी व्‍यवस्था की गई है। 600 नलकूप, 5 बोरिंग है खेल के दर्जन भर मैदान है। 7 सरकारी बैंक है। कृषि समिति, दुग्‍ध समिति मत्‍सय समिति आदि यहां की सक्रियता संबंधी जानकारी देते हैं। 35 किलोमीटर की पिचढलाई सड़क और 120 किलोमीटर की ईटं निर्मित सड़क यहां के परिवहन व्‍यवस्‍था को गति प्रदान करते हैं।

विधुत परिसेवा की कमी है। 17 डिजल इंजिन चालित जेनरेटर से प्रतिदिन शाम 5.30 से 9.30 तक 4 घंटा तक बिजली रहती है। सौरशक्ति से 10 गांवों को बिजली पहुंचाई जाती है। पवन चक्की से भी ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है।

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यहां पर बिजली पहुंचे इसकी परियोजना पर काम चल रहा है। और अनुमान है कि दो वर्षों में यह काम पूरा हो जाएगा।

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दोपहर दो बजे तक हमारी वापसी की यात्रा शुरू हो चुकी थी। जलयान द्वारा कोचु‍बेडि़या से लट नं. 8 वापस आए। वहां से पुनः अपनी गाड़ी से शाम छह बजे तक कोलकाता के अपने आवास तक पहुंच गए।

लौटते समय मन में यही भाव थे –

मातः शान्‍तति शम्‍भुसंगमिलिते मौलो निधायां‍जलिं।

त्‍वत्तीटे वपुषोsवसानसमये नारायणांध्रिद्वयम्।।

त्‍वन्‍नाथ समरतो भविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्‍सवे।

भूयाद्भक्तिरविच्युता हरिहराद्वैतात्मिका शाश्‍वतौ।।

हे मातः! तुम शंभु का निजस्‍व हो, उनके अंग से एकात्‍म हो। तुम्‍हारा प्रसाद जिसे मिला, वह मृत्‍युंजय हुआ। तुम्हारे तीर पर मरण के वरण से आनन्द और मुक्ति का लाभ होता है। इसी कारण मस्‍तक पर करबद्ध प्रणाम करके कहता हूँ--- मां, मेरे अन्तिम समय में तुम्‍हारा पुण्‍य सलिल मेरे शरीर पर पडे़, मैं नारायण का नाम लेता-लेता एवं तुम्‍हारा स्‍मरण करता-करता ही अद्वैत हरिहरात्‍मक ब्रह्मा की परमभक्ति में, अचला भक्ति में लीन हो जाउँ। मुझे परमगति की प्राप्ति हो।

प्रस्तुतकर्ता

मनोज कुमार

Tuesday, March 23, 2010

कौन है यह..........नागा सन्यासी....?











कौन है यह नागा सन्यासी ? में अब तक आप यह जान चुके है किस तरह इन अवधुतियों का प्रादुभाव हुआ और जनसाधारण ने इन्हे नग्न अवस्था में देखकर परमहंस सन्यासी के स्थान पर नागा सन्यासी की संज्ञा दी। अभी तक जो साहित्य इस विषय पर उपलब्ध है उस पर अभी भी शोध बाकी है जो कुछ लिखा गया है उससे विद्वानजन व अन्य संत आदि पुरी तरह से सहमत नही है उनके अनुसार सही तथ्य अभी प्रकट नही है ............अब आगे---- इन दशनामियों के दो अंग होते है शस्त्रधारी व अस्त्रधारी,शस्त्रधारी शस्त्रों आदि का अध्यन करके अपना अध्यातिमिक विकास करते है व अस्त्रधारी अस्त्रादि में कुशलता प्राप्त करते है ।
इन नागा सन्यासियों का धार्मिक ही नही राजनैतिक महत्व भी है इनकी स्थापना जिन उद्देश्य को लेकर हई थी उनमें इन्होने अपने पराक्रम साहस का अभूतपूर्व परिचय दिया,उत्तर मुगलकालीन भारत में इन नागे सन्यासियों ने अपने सैनिक कार्य में ख्याति पाई ही साथ ही उन्होने उस समय के वाणिज्य व्यवसाय में भी अच्छा हाथ बंटाया व्यापारिक केन्द्रों में अपने मठ स्थापित किये, नागा संन्यासियों ने राजनैतिक एंव व्यवसायिक दोनो ही क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किये ।
सनातन धर्म की रक्षा के लिए ही नागा सन्यासियों का जन्म हुआ यह सब आप भाग 1 व भाग 2 में पढ चुके है अत्याचारी व हिन्दु का दमन करने वाले मुस्लिम शासको के साथ इन्होने कठिन से कठिन लडाइयां लडी ...............

कुछ प्रमुख युद्व इस प्रकार है काशी के ज्ञानवापी का युद्व -
1664 ई0 में औरंगजेब ने काशी ज्ञानवापी एंव विश्वनाथ के मन्दिर पर आक्रमण करके अपने सेनापति मिर्जा अली तुंरग खां एंव अब्दुल अली को विशाल सेना के साथ काशी भेजा, इस आक्रमण के भय से काशी में सर्वत्र हाहाकार मच गया जो रक्षा कर सकते थे वह भी आक्रमण्कारियों के साथ मिल गये ऎसे में नागा सन्यासियों ने अपने शस्त्रों के भयानक प्रराहों से उनको पूर्णतया पराजित कर वहां से भगा दिया इस युद्व में नागा सन्यासियों ने विश्वनाथ की गद्दी की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रख औरगजेब की सेना पर विजय प्राप्त की खुद को योद्वा प्रमाणित कर महान यश को प्राप्त किया ।अन्य युद्वों बारे में अगले भाग में ..........till then , keep visiting Ganga Ke Kareeb
sunita sharma
freelancer journalist

Monday, March 8, 2010

गंगा के करीब ,कुम्भ नगरी के कुछ दृश्य










































कुम्भ नगरी गंगा के करीब बस चुकी है बिलकुल अलग व एक आलौकिक नगरी है लगता है किसी दूसरे ही लोक मे आ गये हो।यह नजारे दुर्लभ है, आलौकिकता का कुम्भ........?

Saturday, February 13, 2010

महाकुम्भ 2010 हरिद्वार-------पूरे वैभव के साथ सम्पन्न हुआ महाशिवरात्रि पर अखाडों का....... पहला शाही स्नान

शाही स्नान की तैयारियां,वार्तालाप








देवता की पालकी









स्नान को जाते सन्यासी,पूरे शानौ-शौकत से 





अवधुतों का वैभव 

नतमस्तक हो गयी कुम्भ नगरी हरिद्वार, इन अवधूतों को देख कर ।




















नागाओ के साथ- साथ साधु -सन्तों की विलक्षणता के हुए दर्शन



































हर-हर महादेव के जयकारो के साथ कुम्भ महापर्व का पहला शाही स्नान शुरू हुआ। जुना अखाडें के देवता की पालकी बहृमकुण्ड में प्रवेश करती है, भस्मीभूत कायावाले लम्बी जटाधारी नागासन्यासी कूद पडते मां गंगा में स्नान करने के लिए.............. अद्वभुत दृश्य............. खत्म होता है 12वर्षो के उपरान्त का इन्तजार 12फरवरी महाशिवरात्रि 2010 को जब  सुबह 10:40 के बाद  शुरू हुआ अखाडों स्नान शाम साढे छ बजे बाद ही खत्म हुआ ।जिन अखाडों ने स्नान किया जुना,आवहान व अगिन  अखाडा निरजनी एंव आनंद अखाडा ,महानिर्वाणी तथा अटल अखाडा।
(all pictures sources TVENW
news agency)

Wednesday, December 30, 2009

हरिद्वार........ कुम्भ नगरी भाग 3


हरिद्वार की ख्याति दिल्ली सल्तनत तक फैल चुकी थी यह सब आप पिछले भागों में पढ चुके है अधिक प्रसिद्धि ही क्षति का कारण बनने लगी 12वी सदी के बाद से ही यहां हमले होने लगे थे सर्वाधिक क्षति 1398 में तैमूर लंग के हमले के कारण हई इसी समय कनखल मायापुर की विनाशकारी ध्वंस एंव लूट लीला हई थी ।


सैयद-लोदी शासनकाल में यह तीर्थ सल्तनत की किरकिरी बना रहा पर शिवालिक श्रेणियों ने घने वनों ने इस तीर्थ पर आने विपदा से रक्षा की । रामानन्द के आगमन के बाद रामावत सम्प्रदाय और वैष्णव लहर जो चली उसमें वल्ल्भाचार्य की बैठक ने हरिद्वार को हरिमय बना दिया। उत्तराखण्ड यात्रा में यात्रियों,वैरागियों की अभूतपूर्व वृद्वि होने लगी । अकबर की सहष्णुता ने मानसिंह  को हरिद्वार में पैडीघाट तथा छतरी बनाने की प्रेरणा दी ।    


लंडौरा राज्य कायम होने पर कनखल में सुन्दर मंदिर बने मराठों ने रूहेलखण्ड ,दुनमाल को लूटा परन्तु 176ई0 में अहमदशाह अब्दाली से पानीपत का तीसरा युद्व हारने पर मराठों की छत्रछाया हटने पर पुन: रूहेलों के धावे होने लगे । 1785 में गुलाम कादिर ने हरिद्वार को लूटा । 1796 ई0 में पंजाब के सिक्ख सरदारों ने गुसाइयों से अनबन होने पर घुडसवारों के बल पर अन्तिम स्नान के दिन सो सन्यासी,वैरागी,गुंसाई नागा मार डाले ।1804ई0  में गोरखों का गढवाल पर अधिपत्य होने से हरिद्वार ,स्त्री, पुरूष दासों की बिक्री का एक बडा केन्द्र बन गया  ।

1855 में मायापुर से गंगा नहर निकाली गयी इससे मायापुर का पुन: विकास होने लगा ज्वालापुर समृद्व मण्डी बन गया । 1886 में लक्सर से व 1900ई0 में  देहरादून रेलमार्ग जुडने से यह तीर्थ नगर अधिक विकसित होने लगा । आज यह पूरे विश्व में प्रसिद्व है, 2010 कें महाकुम्भ की अगुवायी को तैयार है। 




सुनीता शर्मा





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