blogvani.com पर श्री अरुण खण्डेलिया का आलेख पढा. वर्तमान के सर्वव्यापी निराशाजनक दौर में यह आलेख आशा की किरण देखना चाहता है. अरुण को निराशा दिखती है, और वह आशा का आकाँक्षी है. यह निराशा के दर्शन होना ही भ्रम है. निराशा वास्तव में है नहीं. अस्तित्व में नकारात्मक भावों का कोई स्थान ही नहीं, उनका स्तित्व ही नहीं. यही भाव बन गये इस ट्टिपणी में-
चाह से राह बने और श्रम से मिले सफ़लता पूरी.
अरुण ने दिया सूत्र, बात यह नहीं अधूरी.
नहीं अधूरी बात, किन्तु क्यों दिखे निराशा?
जीवन को समझो बन्धु! आशा ही आशा.
कह साधक छोङो अपनी, समझो अस्तित्व की चाह.
श्रम से मिले सफ़लता पूरी, चाह से बनती राह.
फ़िर मैं अनायास ही ज्ञानवाणी पर आया. वहाँ सँवाद बनाता एक आलेख पढा, लेखक अपने लेख पर ट्टीपणी चाहता है. ट्टिपणी से ही पता चलता है के उसके शब्द सार्थ है भी या नहीं. तत्काल भाव बने और यह ट्टिपणी छोङकर आगे बढ गया.
सच कहा है ट्टिपणी,जरिया-ए-सँवाद.
सारे ब्लागर सहमत हैं, इस पर नहीं विवाद.
इस पर कहाँ विवाद, किन्तु हे बन्धु जान लो.
सार्थक हो सँवाद, बात इतनी सी मान लो.
इस साधक ने जो भी कहा है, सच कहा है.
सँवादों का मार्ग ट्टिपणी, सच कहा है.
9-जनवरी को अपने हैद्राबाद प्रवास की उपलब्धियों का खाका बनाने का मन हुआ. मेरा सारा काम इसी लेपटोप पर होता है, और इसमें कुछ भी गोपनीय नहीं है, आप भी देखें…
गीता-चर्चा सत्र में श्रीराम से परिचय हुआ. २७ दिसम्बर को उन्होंने लेब में बिठाकर अनुसारका पर खाता खोल दिया. अगले दिन स्नेह के साथ लगभग एक घंटा सिखाया. स्नेह उसी दिन अपनी सहेली के यहाँ चली गई, मेरे लिये सीखने-समझने की प्रेरणा बनकर.
विनीत जी का मार्ग-दर्शन, संस्कृत व्याकरण को आधार बनाकर अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद करने का सोफ़्टवेयर बन रहा है, उसमें मेरी भागीदारी स्वीकारी गई, गौरव का अनुभव होता है. बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.
काम शुरु किया तो अदितीजी, सुखदा, शीतल और दीप्तीजी का प्रसन्नता भरा सहयोग मिला. सुखदा अस्वस्थ लगी. एक और बुजुर्ग महिला हैद्राबाद से नित्य आकर अनुसारका पर काम करती है, निष्ठा अनुकरणीय है. उनसे तेज चलना तय है.
नौमान की सहायता, रोहित जी की मित्रता, ज्योतिष सुमन और चन्द्रिका से जुङाव, बैजू नन्दा ने ओडियो पर चलता काम सिखाया…. अभिजित ने मेरी नईआशा देखी तो आश्वस्त हुआ कि यहाँ से बहुत कुछ मिलेगा. फ़िर ऋषभ और देवांश- सुशान्त का सहयोग, हर तरफ़ से जैसे मेरे लिये हाईटेक होनेकी सङक तैयार हो रही है.
नौमान का सम्पर्क- हिन्दी से दक्षिण भारतीय भाषाओं को सीखने का औजार होगा. बैजू जी का ’रवि’ अभी प्रारंभिक अवस्था में है, दो दिन उसपर अभ्यास किया, उसके उचारण को बेहतर बना सकता हूँ… समय साध्य है.
रोहित बार-बार समझा रहे हैं कि मेरी क्षेत्र लेखन है, यह तकनीक नहीं. वैसे भी तकनीक मानवीय दिमाग से अभी काफ़ी पीछे है. इसे जन-जन सुलभ बनाने की चुनौती है
अश्यन सामरा ने पाली-संस्कृत वाक्य रचना बताई, मुझसे पूछा. नवज्योति सिंह से मिलाया.
ईशान नाम से दो बच्चों ने धन पाने की उम्मीद में सहयोग दिया. तीन बार बैठे. वही कुछ सिखाया, जो पहले ही नौमान ने सिखा दिया था. अब वे सहीआशा को सजाने का काम २००० में करने को तैयार हैं, मेरा मन करता है कि स्वयं करूँ. रूपया उनको सुशान्त के माध्यम से देना है.
कमरे में ज्योतिश, ऋषभ, बैजू, श्रीराम, ईशान, अशयन आदि आये. वरुण की सहायता सदा अधूरी रही, बिचारा बास्केट बाल कोर्ट में टांग तुङवा बैठा है.
सोनल के नृत्य का एक टुकङा मिला, अब तक नहीं देख पाया हूँ. बेशक ४ हिन्दी फ़िल्में गटक गया.
बाकी काम-
१- सुशान्त एक जीनीयस से मिलायेगा.
२- राजीव संगल साहब के पास अपना मन रखना.
३- अपने ब्लाग पर आडियो-वीडीयो चढाना, आवश्यक उपकरण खरीदना.
४- अनुसारका पर एक पृष्ठ पूरा करना.
५- अनुसारका का हिन्दी अनुवाद करके देना.
६- बैजू से आगे के प्रोजेक्ट पर चर्चा, अपनी पुस्तकों का कोर्पस बनाना…. उस पर फ़ोनेटिक्स का प्रयोग करना.
और वे जीनीयस हैं अनिलजी. स्वयं मेरे कमरे में आये. अत्यन्त दुबली-पतली काया, चमकती आँखे, खद्दर के बिना आयरन हुये कुर्ता-पैजामा. उनके लिये यह कुण्डली बनी-
प्यासे ने अमृत पाया, अंधे को मिली ज्यॊ आँखें.
बिन माँगे मिल गये अनिलजी, ऊङूँ लगाकर पाँखें.
ऊङूँ लगाकर पाँखें, ओडियो और वीडीयो.
अभी सिखा देंगे तुझको, मन लगा सीखीयो.
सुन साधक करना है सारा काम स्वयं ने.
अंधे के मिली आँख, अमृत पाया प्यासे ने.-
उनके जाने के बाद फ़िरसे ब्लाग यात्रा चली. भारतीय नागरिक ब्लाग पर तीन ट्टिपणियाँ और अविसाश जी के नुक्कङ पर बनी एक ट्टिपणी कहकर आज विराम लेता हूँ.
भारतीय नागरिक बताओ, कहाँ तुम्हारा देश?
यह भूमि इण्डिया बनी, अब कहाँ है भारत देश?
कहाँ है भारत देश,ज्ञान-आलोक कहाँ है?
सारे जग को कुटुम्ब बनादे, वह जजबात कहाँ हैं?
कह साधक मुझको उस देश का पता बताओ.
कहाँ तुम्हारा देश, भारतीय नागरिक बताओ.
कहीं ना कुछ देना ना लेना, सह-अस्तित्व है मित्र.
समझें नियम जियें उत्सव से, सही बनेगा चित्र.
सही बनेगा चित्र, उदासी हट जायेगी.
जीवन में सुख ही सुख, पीङा मिट जायेंगी.
कह साधक कवि समझे हो तो समझा देना.
सह-अस्तित्व है मित्र, ना कुछ भी लेना-देना.
हर शाख पे उल्लू बैठे हैं, तुम एक से ही घबराते.
हे भारतीय नागरिक सुनो, तुम व्यर्थ में ही चकराते.
व्यर्थ ही क्यों चकराते,काम करो कुछ ऐसा.
शाखाओं संग उल्लू को बिसरा दे जैसा.
कह साधक आना होगा अब नई राह पे.
घबरायेंगे वे सब उल्लू, बैठे हर शाख पे.
अविनाशजी,, भगवान से बात
मेरेबिन ’वो’ नहीं, नहीं ’मैं’उसके बिन रह सकता
दोनो साथ-साथ, केवल अब इतना ही कह सकता.
इतना ही कह सकता भगवन! क्यों भटके हर मानव
साथ-साथ रहने का कौशल क्यों ना माने मानव?
कह साधक कविराय, अधूरी चर्चा मुझ बिन.
मैं इसके बिन रह नहीं सकता, यह मेरे बिन.
गंगा किनारे बैठ कर साधना का मन करता है, अतः यह पोस्ट वहीं पढी जाये. –
साधक उम्मेदसिंह बैद sahiasha.wordpress.com
यह ब्लाग समर्पित है मां गंगा को , इस देवतुल्य नदी को, जो न सिर्फ मेरी मां है बल्कि एक आस्था है, एक जीवन है, नदियां जीवित है तो हमारी संस्कृति भी जीवित है.
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Saturday, January 23, 2010
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