Monday, September 28, 2009

गंगा नदी ही नही एक अद्भभुत संस्कृति भी--भाग-3







गंगा नदी ही नही अद्वभुत संस्कृति भी ..भाग -2 से आगे........
हिमालय से लेकर गंगासागर  के सफर में इसके किनारे बसे नगरों एंव संस्कृति की शुरूवात तो गंगोत्री से ही हो जाती है 6माह शीतकाल में गंगोत्री में भले कोई न जाता हो पर ग्रीष्मकाल शुरू होते ही गंगोत्री में लोगो जमावडा लगना शुरू हो जाते है। 1816ई0 में जेम्स वेली फ्रेजर के दल के लोग जब गंगांत्री पहुंचे तो तीर्थ के वातावरण आैर दृश्य देख कर चकित रह गये थे।इसके किनारे बसे नगरों में शिवालिक पर्वत माला के आस-पास का क्षेत्र सदियों से साधु -संतो के तप व सिद्वि के स्थल रहे रहे है। 
(चित्र गंगोत्री मंदिर : गंगोत्री)

हिमालय की कंदराअो में महर्षि व्यास ने पुराणों की रचना की।उत्तर दिशा से भागीरथी तथा पूरब दिशा से अलकनन्दा के संगम के बाद ही इन नदियों का नाम गंगा पडता है  । इसके किनारे बसे नगर को देवप्रयाग कहते है जिसे सुदर्शन तीर्थ के रूप में भी जाना जाता हैं। भागीरथी के पावन संगम पर बसे पंचप्रयागों में यह एक प्रमुख प्रयाग है। 
<---(चित्र--देवप्रयाग,भागीरथी व अलकनन्दा का संगम)

        (चित्र :कुम्भनगरी हरिद्वार) ----->                                                                                               


ऋषिकेश तो ऋषियों की तपस्थली रहा है ,प्राचीन समय में यह अग्नि स्थान एंव वैष्णव तीर्थ के रूप में विख्यात हो चुका था । गंगाद्वार अर्थात हरिद्वार से कौन परिचित नही है यही से गंगा का मैदानी सफर शुरू हो जाता है । कहते है गंगा सब जगह आसानी से मिल जाती है पर प्रयाग सागर संगम एंव हरिद्वार में गंगा तक पहुंचना दैवीय कृपा होती है इस पौराणिक कुम्भ नगरी का महामत्य बहुत अधिक  है आगामी 2010 में कुम्भ मेला भी अबकी बार हरिद्वार में ही पड रहा है जिसमें भाग लेने देश से ही नही देश से भी साधु-महात्माआे एंव आम लोगों के अलावा शासन प्रशासन की भी तैयारियां शुरू हो चुकी है।
गंगातटीय नगरों मे प्रयाग व त्रिवेणी संगम का भी बहुत महत्व है । गंगा यमुना के संगम में स्नान करने वालों को 10 यज्ञों का लाभ मिलता है क्योकि संगम पर देवताआे , द्विकपालों , लोकपालों ,सिद्वों सनतकुमारों ,सूयदेव आैर महाविष्णु का निवास है । सांस्कृतिक एंव एतिहासिक  नगरी प्रयाग गुप्तकाल में अपने उन्नति के  चरमोत्कर्ष पर थी ।चीनी यात्री हृवेनसांग 629 में प्रयाग में हर्षवद्वन द्वारा आयोजित धार्मिक सम्मेलन में  भाग लेने आया था ।
 काशी या वाराणशी भी उत्तरवैदिक  काल में परम ख्याति पर थी । हुवेनसांग ने उल्लेख किया है कि वाराणसी हर्ष साम्राज्य का समृद्वशाली  भाग थी । काशी शिक्षा ,विज्ञान ,एंव संगीत का केन्द्र बनी तो में काशी सातवीं शताब्दी में आयुवेदाचार्यों का सम्मेलन वर्ष भर चलता था। गंगा किनारे जो भी संस्कुति पनपी वह विकसित व समृद्व ही रही । इस देवतुल्य नदी ने हम मनुष्यो को क्या नही दिया आैर हमने बदले में गंगा नदी को क्या दिया ? यह बाद में, पहले थोडा इसके  किनारे बसे नगरों के वैभवशाली अतीत पर नजर डालते हुए आगे  बढते  है ..........  



काशी के घाटों तथा पाठशालाआे में महान विभूतियां पैदा हुई । काशी भक्ति आंदोलन का केन्द्र बनी तो 19वी सदी में पुनरूत्थान का केन्द्र बनने का गौरव भी इसे ही प्राप्त हुआ । इस नगरी ने भारत को कला ,साहित्य ,दर्शन ,संगीत नृत्य एंव शिक्षा के क्षेत्र में भी महान उपलब्धियां प्रदान की ।यहां  गंगा की लहरों में वाराणसी की प्राचीन संस्कृति का संगीत आज भी सुनायी देता है।
एक आेर महत्वपूर्ण प्राचीन एतिहासिक नगर का नाम गंगा से जुडा है वह है पाटलिपुत्र जहां गंगा व सोन नदी के संगम पर राजनीतिशास्त्र,बौद्व व जैनधर्मो  ने अपना विकास  किया ,सम्राट अशोक भी यही की देन है। जिसने बौद्व धर्म का प्रचार प्रसार दूसरे देशों में किया। इसी तरह कन्नौज,काम्पी एंव बिठ्रठूर जैसे गंगा  के किनारे बसे नगरों का सम्बन्ध सांस्कतिक  एंव साहित्यिक आंदोलनों से रहा है।..................शेष अगले भाग में (वर्तमान परिपेक्ष्य में गंगा) 


                                                           ________________ 
(कुछ चित्र गुगल से साभार)






















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8 comments:

विनय ‘नज़र’ said...

विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

एकलव्य said...

गंगा नदी अपने आप में एक संस्कृति है ...विजयदशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ...

sanjay vyas said...

शुभकामनाएं दशहरा पर्व की.गंगा हमारी संस्कृति का प्राण है.ये श्रृंखला गंगा माई को एक अद्भुत आदरांजलि है

Sunita Sharma said...

आप सभी का शुक्रिया जो इतनी अच्छी टिप्पणी मेरे इस लेख को प्रदान की......
आप सभी को दशहरा की शुभकामनाए।

Kishore Choudhary said...

सामान्य जानकारी की अद्भुत श्रृंखला चल रही है, बहुत अच्छा !!

Ummed Singh Baid "Saadhak " said...

शोध पूर्ण आलेख का, अभिनन्दन- आभार.
सुनिताजी ने ले लिया गंगा का गुरुभार.
गंगा का गुरु भार, कि गंगा बचे तो बेहतर.
जीने का आधार, धरा पर चले तो बेहतर.
पर साधक बचने पर प्रश्न बङे हैं इतने.
गंगा और हिमालय डूब जायेंगे जितने.

Sunita Sharma said...

साधक जी आपने मेरे आलेख पर कमेंट किया बहुत सही लिखा है आपने गंगा बचे तो बेहतर गंगा व हिमालय डूब जायेगें क्या सचमुच एेसा होगा आने वाले वक्त मे क्या होगा इसका जवाब तो शायद किसी के भी पास नही?

Ummed Singh Baid "Saadhak " said...

हर सवाल का जवाब है, नियम प्रकृति का जान.
क्यों डूबे गंगा-पर्वत, कैसे बचे सुजान.
कैसे बचे सुजान, जान सकता हर मानव.
बहुत जरूरी जानें आप सरीखे मानव.
पुण्यशील, मेधासम्पन्न,सुलझे मानव.
कह साधक सोचें क्या लक्ष्य है इस सँवाद का?
नियम प्रकृति का जान, जवाब है हर सवाल का.
०९९०३०९४५०८. साधक