Wednesday, September 8, 2010

ज्योतिष की सीमा

पहली बार ज्योतिष से परिचय हुआ.
होरा, संहिता और सिद्धान्त से लेकर
दशा, महादशा, अन्तर्दशा और
विंशोत्तर दशा तक
सारे शब्द नये थे मेरे लिये.
हिन्दुत्व पर मानपूर्वक
हजारों गीत रच देने वाला यह साधक
स्वीकार करता है
कि उसे पंचांग देखना तक न आता था.
वेदों पर अधिकार पूर्वक ट्टिपणी करके भी
वेदांग के इस प्रथम और
प्रमुख अंग से परिचय तक न था मेरा.
पूरी देहयात्रा
अन्यान्य दर्शनों का सार ढूंढता रहा
्मगर अपने हाथ में बनी
रेखाओं से परिचय न पा सका.
वसुधैव कुटुम्बकम पर भाषण कर लेता
मगर अपने घर के वास्तु से अनजान था.
धन्यवाद डा. मनोज श्रीमाल
आपने यह सब बताया.
दस दिनों के लिये निर्धारित पाठ्यक्रम को
संस्थान-अधिपति के देहावसान वश
आठ दिनों में पूरा कराया.

ज्योतिष से परिचय पाकर
इस सिद्धान्त की पुष्टि हुई

कि मानव का सम्बन्ध
परमाणु से अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड तक है.
जो है, उसे जाना जा सकता है.
मानव सब कुछ जान सकता है,
क्योंकि मानव सब कुछ जानना चाहता ही है.
कि सारी सृष्टि नियमतः है, नियमपूर्वक चलती है.
और नियमतः
मानव की हर न्यायपूर्ण चाहत के
पूरा होने की व्यवस्था है.
और ज्ञान प्राप्त करने की चाहत
पूर्णतः न्यायपूर्ण है, नैसर्गिक है.
जो कुछ मेरे पूर्वज जान गये, वह मैं जानता ही हूँ.
क्योंकि मैं ही पाराशर और भृगु हूँ
मैं ही मिहिर और कीरो.
क्यों कि मैं निरन्तर है.
मैं कहीं आता जाता नहीं.
देह और मैं का योग है मानव.
नाम-रूप इस योग का है.
योग का वियोग निश्चित है.
वियोग हुआ तो नाम-रूप बदल जाता है.
योग-वियोग देह का होता है,
मैं शरीर को वैसे ही छोङ देता है
वैसे ही जैसे फ़टा वस्त्र छोङ दिया जाता है.
वासांसि जीर्नानि यथा विहाय,
नवानि ग्रह्णाति नरोपराणि.
तथा शारीराणि विहाय जीर्णान
नृन्यानि संयाति नवानि देही.


महाप्रज्ञ को अमर नहीं किया जा सकता.
नाम-रूप को
न लौटाया जा सकता है
न उससे जुङी स्मृतियाँ चिरकाल चलती हैं
निरन्तर बदलती सृष्टि में
भौतिक-रासायनिक वस्तुओं में
परिवर्तन होता रहता है.
मगर

यह जो मैं है, कभी मरता नहीं.
महाप्रज्ञ मैं रूपमें निरन्तर है.
यह भाषा निर्मित भ्रम है
जो मैं है को मैं हूँ बनाता है.२
अहं ब्रह्मास्मि की जगह
अहं ब्रह्मास्ति होता,
तो तत्वमसि या सर्वंखल्विदं ब्रह्म की
जरूरत ही ना थी.
और ना ही ज्योतिष-विज्ञान की.
मैं है को मैं हूँ कहते ही
ज्योतिष की भूमिका आरम्भ होती है.
अर्थात--भौतिक-रासायनिक क्रियाओं तक है
ज्योतिष का क्षेत्र. बस!

९ ग्रह, १२ राशि और २७ नक्षत्रों की
परस्पर गतियों सहित
उनके परस्पर प्रभाव और
मानव पर पङने वाले प्रभावों का
आकलन ही फ़लादेश है.
सारा प्रभाव देह और मन-वृत्ति तक है.
चित्त पर आते-आते
ज्योतिष का प्रभाव आधा रह जाता है.
चित्त की दो भूमिकायें- चित्रण और चिन्तन.
चित्रण यदि ज्योतिष से प्रभावित है
अर्थात देह भाव से प्रभावित है
तभी सुख-दुख की गणना है.
चिन्तन बुद्धि से प्रभावित
अतः वहाँ ज्योतिष अप्रभावित रहता है.
चिन्तन के स्तर पर दुःख का अस्तित्व नहीं.
वहाँ मैं का साम्राज्य है
वहाँ जीवन है
और जीवन कालातीत है.
कालजयी ही नहीं- कालातीत!
काल को जीतना नहीं है
काल को जानना है
जानते ही जीत लिया जाता है काल.
चिन्तक थे सभी ज्योतिषविद.
काल के ऊपर उठकर
काल-पुरुष को देखा- जाना
इसीलिये ज्योतिष वेदांग का सिर है
इसी अर्थ में वेद परमात्मा है.
ग्रन्थ सिर्फ़ इशारा करता है.
शब्द ब्रह्म बने- तभी अक्षर को जान पाता है
अन्यथा ग्रन्थों में भटकाता है.
शब्द यदि अक्षर को जानने में सहयोगी बने
शब्द यदि ब्रह्म तक ना पहुँचा सके
तो भ्रम फ़ैलाता है…
ग्रन्थों में भटकाता है
मारता और पुनः जिलाता है
ज्योतिष की
जटिल गणनाओं में उलझाता है.

इसी देह-यात्रा में
मानव समग्र को जान सकता है.
देह चलाने का प्रयोजन भी यही है.
ज्योतिष का प्रयोजन
दुख के पार पहुँचाना है
बीमारी ठीक करना नहीं!
सारे उपचार व्यापार हैं
हर व्यापार परिवार भाव को काटता है.
परिवार भाव ही भारत, व्यापार भाव इण्डिया-पश्चिम.
भारत ज्ञानारधना का नाम है, सीमायें नहीं.-
sadhak ummedsingh baid