Wednesday, November 28, 2012

श्रद्वालुओं की सिद्वियों का केन्द्र...........भैरव मंदिर ऋषिकेश

ऋषिकेश के लक्ष्मणक्षूला मार्ग में चन्द्रभागा नदी के पुल को पार करते ही ,भैरवनाथ का प्राचीन मंदिर स्थित हे । इस मंदिर में भैरव की विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठत है । 
गढवाल में भारत के अन्य भागों की तरह शिव प्रतिमा के दो रूप प्राप्त होते है ,लिंग प्रतिमा व रूप प्रतिमा । रूप प्रतिमा में शिव को विभिन्न मूर्तियां परिलक्षित हई । जिसमें शिव की वीणाधर दक्षिणामूर्तियां,कल्याण सुंदर मूर्ति,शिवनृत मुर्ति, उमामहेशवर मुर्ति, हरिहर मूर्ति एवं भैरवमूर्ति  सम्मिलित है। इस क्रम में शिव की शान्त मूर्तियों में दक्षिणामुर्तियां शिव के ज्ञान विज्ञान और कलाओ के उपदेशक के रूप कल्याण सुंदर मुर्ति प्रसिद्व  रूप नटराज की है । उमामहेश्वर व हर गौरी रूप गढवाल हिमालय में सर्वाधिक प्रचलित रूप  रहा है। उमामहेश्वर  की मूर्तियां एकता के तांत्रिक
सिद्वांत पर बल देती हैं । हरिहर की मुर्तिशिव परिवार में वर्णित है , यह शिव की सौम्य लीला मर्ति मानी जाती है ।उपरोक्त सभी मूर्तिरूव शिव के सौम्य रूप को दर्शाती है ।भगवान यिव का सौम्य व शांत रूप ही नही वरन उनके उग्र व अशांत रूप की प्रतिमायें भी मिलती है । हिन्दू त्रिमूर्ति में उनका संहार रूप भी प्रकल्पित हुआ है । इस केदार भूमि में शिव के अनेकों रूपा के की पूजा की जाती रही है भैरव रूप की महत्ता का वर्णन स्कन्द पुराण में मिलता है । जिसके अनुसार "तत्रैप गुणपों नाम भैरवों भीषणा कृति
यस्य दर्शन मांत्रेण नरो यति परागतिमा "।।(स्कन्द पुराण 9121अध्याय) 
इसका तात्पर्य है कि गणप नामक भैरवनाथ के दर्शन  को प्राप्त कर मनुष्य परम गति को प्राप्त होता हैं। 
जारी है ...........आगे जानने के लिए देखते रहे , ब्लाग गंगा के करीब

2 comments:

Sunita Sharma said...

गंगा के करीब पर बहुत समय से कोई भी नयी पोस्ट प्रकाशित नही होने का खेद है । उम्मीद है मंदिरों की श्रृंखला में यह नया आलेख इस कमी को पूरा करने में पर्याप्त होगा ।

संदीप पवाँर (Jatdevta) said...

एक बार यहाँ जाना हुआ था।