Monday, March 8, 2010

गंगा के करीब ,कुम्भ नगरी के कुछ दृश्य










































कुम्भ नगरी गंगा के करीब बस चुकी है बिलकुल अलग व एक आलौकिक नगरी है लगता है किसी दूसरे ही लोक मे आ गये हो।यह नजारे दुर्लभ है, आलौकिकता का कुम्भ........?

Wednesday, February 24, 2010

कौन है यह..........नागा सन्यासी....? भाग -दो

पिछले आलेख मे आपने पढा हिन्दु धर्म की रक्षा हेतु भारत के समस्त भागों में स्थित हजारों मठों के संचालक,विशिष्ट सन्यासी महात्मा व सनातन धर्म के ज्ञाता विद्वान एकत्रित हए......अब आगे .........विचार विमर्श के बाद यह निश्चित हुआ कि शांत भाव से धर्म प्रचार करने मात्र ये सनातन धर्म की रक्षा नही हो सकती अत: परमात्मा रूप में संहारकारी भैरव स्वरूप की उपासना करते हुए हाथों में शस्त्र धारण करके बलपुर्वक सनातन धर्म को नष्ट करने का प्रयत्न करने वाले दुष्टों का संहार किया जाये...........................

यह निश्चय किये जाने पशचात शस्त्रों से सज्जित होने के लिए समस्त दशनाम का आहवान किया गया ,जिनका आवहान किया गया उसमे विरक्त संन्यासियों के अतिरिक्त ऎसे युवकों को भी शामिल किया गया जिनके मन में सनातन धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व बलिदान करने की प्रबल भावना थी , इन नवयुवको को संन्यास की दीक्षा देकर संसार के समस्त बंधनों से उत्सर्गित होने के निमित्त प्रेरित किया गया । हजारों की संख्या में नवयुवक सन्यास -दीक्षा लेकर सनातन-धर्म की रक्षा करने के लिए कटिबद्व हो गये ।







 परमात्मा के भैरव स्वरूप की अविच्छन शक्ति प्रचण्ड भैरवी भगवती दुर्गा का आवहान करके उनके प्रतीक के रूप  भालों की स्थापना की गयी । उन्ही भालो के सानिध्य में दशनाम नागा संन्यासियों को शस्त्र संचालन का प्रशिक्षण कर शस्त्रों से सज्जित किया गया । 


इन संन्यासियों ने कालान्तर में शस्त्र के अतिरिक्त वस्त्र आदि का भी परित्याग कर दिया ,सनातन धर्म की रक्षा के लिए स्वयं को बलिदान करके यज्ञकुण्ड की प्रतिनिधि धूनियां लगाते हुए सामुहिक रूप से विचरण करने लगे अपने उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए वस्त्रों का परित्याग कर देना इन्हें अधिक सुविधाजनक लगा ।शंकराचार्य से पूर्व जैसे परमहंस सन्यासी वस्त्र त्याग कर दिगम्बर अवस्था में रहते थे उसी प्रकार वे भी वस्त्र  त्यागकर शरीर में भस्म रमाये दिगम्बर अवस्था में रहने लगे जनसाधारण  में उन्हे नग्न अवस्था में देखकर परमहंस सन्यासी के स्थान पर नागा संन्यासी की संज्ञा इनके लिए प्रचलित हो गयी.......................अभी जारी अगले भाग में ....पढते रहे गंगा के करीब पर कौन है यह नागा सन्यासी ? के तृतीय भाग में । 
Sunita Sharma 
freelancer journalis


Tuesday, February 23, 2010

तो गंगा की सुध आ ही गयी......... राष्ट्रपति का आश्वासन 2010 तक गंगा प्रदुषण मुक्त

आज मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि देश की राष्ट्रपति ने 2020 तक गंगा नदी को प्रदुषण मुक्त कराने का वादा किया है किसी भी गन्दे नाले या औघौगकि कचरे को शोधन के बिना उसमें नही गिरने की व्यवस्था की जायेगी राष्टीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण के मिशन निर्मल गंगा के तहत यह सुनिशचत किया जायेगा कि 2020 तक किसी शहरी नाले व कचरे को बिना शोधन के मां गंगा में न प्रवाहित किया जाये। काश यह सब प्रावधान शुरू से किये होते तो आज हम इन जीवनदायिनी नदियों की दुर्दशा के लिए आवाज न उठाते न दसकी दशा पर आंसु बहाते ।जो नदी हमारी प्राण है उस पर सभी को एकमत व गम्भीर होना है केवल राजनीति से प्रेरित न होकर सार्थक प्रयास हो तभी हम अपनी पृथ्वी ,नदियों ग्लेशियरों व प्रकृति को बचा पायेगे हमे नाज होना चाहिए कि हम बहृमांड के सबसे खुबसुरत ग्रह के निवासी है।मैने अपनी मां गंगा को बचाने की अपील की है समर्थ लोगो से काश मेरा यह सपना पुरा हो जाये, फिर इस नदी की लहरे मुझे रात को आराम से सोने दे.............................।

Saturday, February 20, 2010

कौन है यह..........नागा सन्यासी....?


कौन है यह..........?
 जो शरीर पर भस्म लगाये ,वस्त्र- हीन,अदृभुत रूप वाले, अवधुति........? जन साधारण के मन में नागा सन्यासियों को लेकर कौतुहल व जिज्ञासा का भाव आता है। 
भारत में नागा  अर्थात दिगम्बर सन्यासियो की  परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है  ।     नागाओ के सम्बन्ध में जार्ज गिर्यसन न लिखा है कि नागा शब्द एक धार्मिक समुदाय को सुचित करता है नागा शब्द संस्कृत के नग्नक का अपभ्रंश,हिन्दी का नंगा निर्वस्त्र है इसका अर्थ "वस्त्रहीन धार्मिक भिक्षु "है । भारत में पुरातन काल से ही अनेक धार्मिक सम्मेलन होते आ रहे है उस काल में कुंभ पर्व के सम्मेलनों में भारत से गणमान्य संन्सासीगण एंव सनातन धर्म के ज्ञाता विद्वान एकत्रित होते थे वे लोग विगत तीन वर्षो की धार्मिक गतिविधियों का लेख जोखा प्रस्तुत करते थे तत्पशचात  अगामी तीन वर्षा का कार्यक्रम तय होता था ।........... खिलजी तथा तुगलक वंशीय शासक गण एंव उनके अनुयायी अपने धर्म का प्रचार करने के लिए केवल शास्त्ररूपी राक्षसी भाषा ही जानते थे । उस समय शासको के सहयोग से सनातन धर्म को बलपूर्वक नष्ट करने के प्रयास किये जा रहे थे तब सनाधर्म की रक्षा के लिए एकमात्र उपाय शस्त्र धारण करना ही रह गया है ऎसा निशचित जान सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि अगामी कुंभ पर्व के सम्मेलन में सनातन धर्म के संरक्षक पुर्वाकिंत चारों आम्नायों ये संबधित दशोंवदों के संन्यासियों की मढियों के समस्त मठों के संचालको को विशेष रूप से आमंत्रित किया जाये ,इस निर्णय के अनुसार उससे अग्रिम कुंभपर्व के सम्मेलनो में भारत कं समस्त भागों में स्थित हजारों मठों के संचालक,विशिष्ट संन्यासी महात्मा सनातन धर्म के ज्ञाता विद्वान एकत्र हुए ................  अभी जारी है..... अगले भाग में .. कौन है यह नागा सन्यासी ? 

सुनीता शर्मा

Thursday, February 18, 2010

सौहार्द का प्रतीक बना कुम्भ नगर हरिद्वार।



Posted by Picasaसाधु संतों के साथ दलित मजदुरों ने किया गंगा स्नान,स्नान को जाते संतो संग दलित मजदूर
महाकुम्भ मेले के दौरान धर्म संस्कृति लोगो की आस्था के दर्शन तो होते ही है पर कुम्भ नगर, पहली बार आस्था के साथ समानता भाईचारे व सौहार्द का प्रतीक भी बन गया है। साधु-सन्तो ने दलित मजदुरों के साथ गंगा स्नान कर दिखा दिया कि उनके मन में समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए समान भावनायें है।



समान रूप से स्नान करते साधु -संत व दलित मजदूर
मां गंगा के लिए सब समान है उसकी गोद में सबकों सकून है........... हर-हर गंगे

Saturday, February 13, 2010

महाकुम्भ 2010 हरिद्वार-------पूरे वैभव के साथ सम्पन्न हुआ महाशिवरात्रि पर अखाडों का....... पहला शाही स्नान

शाही स्नान की तैयारियां,वार्तालाप








देवता की पालकी









स्नान को जाते सन्यासी,पूरे शानौ-शौकत से 





अवधुतों का वैभव 

नतमस्तक हो गयी कुम्भ नगरी हरिद्वार, इन अवधूतों को देख कर ।




















नागाओ के साथ- साथ साधु -सन्तों की विलक्षणता के हुए दर्शन



































हर-हर महादेव के जयकारो के साथ कुम्भ महापर्व का पहला शाही स्नान शुरू हुआ। जुना अखाडें के देवता की पालकी बहृमकुण्ड में प्रवेश करती है, भस्मीभूत कायावाले लम्बी जटाधारी नागासन्यासी कूद पडते मां गंगा में स्नान करने के लिए.............. अद्वभुत दृश्य............. खत्म होता है 12वर्षो के उपरान्त का इन्तजार 12फरवरी महाशिवरात्रि 2010 को जब  सुबह 10:40 के बाद  शुरू हुआ अखाडों स्नान शाम साढे छ बजे बाद ही खत्म हुआ ।जिन अखाडों ने स्नान किया जुना,आवहान व अगिन  अखाडा निरजनी एंव आनंद अखाडा ,महानिर्वाणी तथा अटल अखाडा।
(all pictures sources TVENW
news agency)

Thursday, February 11, 2010

MahaKumbh Haridwar 2010......संत संग सितारे....... महाकुम्भ की आस्था


Posted by Picasa











 हरिद्वार में हरिहर आश्रम में आयोजित महामंडलेशवर पटटाभिषेक समारोह में शामिल
हुई शवेता तिवारी।


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यहां वीरभद्र प्रकट हुआ था ----- वीरभद्रेश्वर मंदिर (ऋषिकेश)

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