यह ब्लाग समर्पित है मां गंगा को , इस देवतुल्य नदी को, जो न सिर्फ मेरी मां है बल्कि एक आस्था है, एक जीवन है, नदियां जीवित है तो हमारी संस्कृति भी जीवित है.
Monday, July 25, 2016
Ganga ke Kareeb: चरर्मोत्कर्ष पर है श्रावण मास की कावड यात्रा........
Ganga ke Kareeb: चरर्मोत्कर्ष पर है श्रावण मास की कावड यात्रा........: गंगा के करीब इन दिनों कावड यात्रा अपने चरर्मोत्कर्ष पर पहुच चुकी है । शिव की भक्ति की कामना में रचे बसे कावडियों को तो बस भोले बाबा को जल...
Friday, July 12, 2013
ओं गंगा क्यों बांधा मोहपाश में ..!
देख अपार विस्तार!नहीं झपकी पलक..
बाल कौतुक, सरलता
ओ गंगा ,क्यों बांधा मोहपाश में !
विस्मुर्त अतीत, और गोद,जल में करना आराम.
नहीं भूलते वो पल
निर्मल जल तो कभी धुंधला
कभी शांत तो कभी रौद्र तुम्हारा रूप.
नहीं भूलते वो पल
निर्मल जल तो कभी धुंधला
कभी शांत तो कभी रौद्र तुम्हारा रूप.
बना नितान्त प्रलयकारी
अधम और अज्ञानी
करते रहे नादानी
क्षमा इनके कर्म करो.
ओ गंगा क्यों बांधा मोहपाश में !
समझा नहीं जिन्होंने मोल तुम्हारा
उनका जीवन..क्या जीवन!
तुम्हारा वैभव और गौरव
पुरातन परम्परा व अधर्म
कुसंस्कार और अनैतिकता
सब के बीच रुदन तुम्हारा
सुन कर किया अनसुना
डर है चेतन, अवचेतन में
ओ गंगा, क्यों बांधा मोहपाश में !
अधम और अज्ञानी
करते रहे नादानी
क्षमा इनके कर्म करो.
ओ गंगा क्यों बांधा मोहपाश में !
समझा नहीं जिन्होंने मोल तुम्हारा
उनका जीवन..क्या जीवन!
तुम्हारा वैभव और गौरव
पुरातन परम्परा व अधर्म
कुसंस्कार और अनैतिकता
सब के बीच रुदन तुम्हारा
सुन कर किया अनसुना
डर है चेतन, अवचेतन में
ओ गंगा, क्यों बांधा मोहपाश में !
Sunday, June 30, 2013
छलक पड़े तो ..प्रलय बन गये...!!!!
क्यों हो गयी शिव तुम्हारी जटाए
कमजोर नहीं संभल पाई ........!!!
वेग और प्रचण्डना को
मेरी असहनीय क्रोध के आवेग को
पुरे गर्जना से बह गया क्रोध मेरा
बनकर मासूमो पर भी जलप्रलय
मै............
सहती रही .निसब्द देखती रही
रोकते रहे मेरी राहे अपनी ...
पूरी अडचनों से नहीं ,बस और नहीं
टूट पड़ा मेरे सब्र का बांध और तोड़
दिए वह सारे बंधन जो अब तक
रुके रहे आंसू के भर कर सरोवर
छलक पड़े तो प्रलय बन गए ....
कब तक मै रुकी रहती.. सहती रहती
जो थी दो धाराये वह तीन हो चली है
एक मेरे सब्र की, असीम वेदना की...
उस अटूट विश्वास की जो तुम पर था
खंड खंड है सपने, घरोंदे ,खेत, खलियान
तुम्हारा वो हर निर्माण जो तुमने ,
जो तुम्हारा नाम ले बनाये थे लोगो ने
गूंज रहा है मेरा नाम ......
कभी डर से तो कभी फ़रियाद से
काश तुमने मेरा रास्ता न रोका होता
काश तुम सुन पाते मरघट सी आवाज
मेरी बीमार कर्राहे..........!!!!
नहीं तुम्हे मेरी फ़िक्र कहा
तुम डूबे रहे सोमरस के स्वादन में
मद में प्रलोभन में ,अहंकार में
नहीं सुनी मेरी सिसकिया
रोती रही बेटिया..माँ लेकर तुम्हारा नाम
...देखो प्रभु तुम्हारी दुनिया में
क्या न हो रहा.. तुम मौन साधना में विलीन रहे
कैसे न टूटता फिर मेरा वेग, कैसे रुकता मेरा प्रवाह
रुदन से मेरे आंसू ...को नेत्र न संभाल पाए
खुल गयी तुम्हारी जटाए भी .......
प्रलय को कौन रोक पता ..इसे तो आना ही था !!!
कमजोर नहीं संभल पाई ........!!!
वेग और प्रचण्डना को
मेरी असहनीय क्रोध के आवेग को
पुरे गर्जना से बह गया क्रोध मेरा
बनकर मासूमो पर भी जलप्रलय
मै............सहती रही .निसब्द देखती रही
रोकते रहे मेरी राहे अपनी ...
पूरी अडचनों से नहीं ,बस और नहीं
टूट पड़ा मेरे सब्र का बांध और तोड़
दिए वह सारे बंधन जो अब तक
रुके रहे आंसू के भर कर सरोवर
छलक पड़े तो प्रलय बन गए ....
कब तक मै रुकी रहती.. सहती रहती
जो थी दो धाराये वह तीन हो चली है
एक मेरे सब्र की, असीम वेदना की...
उस अटूट विश्वास की जो तुम पर था
खंड खंड है सपने, घरोंदे ,खेत, खलियान
तुम्हारा वो हर निर्माण जो तुमने ,
जो तुम्हारा नाम ले बनाये थे लोगो ने
गूंज रहा है मेरा नाम ......
कभी डर से तो कभी फ़रियाद से
काश तुमने मेरा रास्ता न रोका होता
काश तुम सुन पाते मरघट सी आवाज
मेरी बीमार कर्राहे..........!!!!
नहीं तुम्हे मेरी फ़िक्र कहा
तुम डूबे रहे सोमरस के स्वादन में
मद में प्रलोभन में ,अहंकार में
नहीं सुनी मेरी सिसकिया
रोती रही बेटिया..माँ लेकर तुम्हारा नाम
...देखो प्रभु तुम्हारी दुनिया में
क्या न हो रहा.. तुम मौन साधना में विलीन रहे
कैसे न टूटता फिर मेरा वेग, कैसे रुकता मेरा प्रवाह
रुदन से मेरे आंसू ...को नेत्र न संभाल पाए
खुल गयी तुम्हारी जटाए भी .......
प्रलय को कौन रोक पता ..इसे तो आना ही था !!!
Wednesday, June 19, 2013
गंगा के करीब ....गंगा की उग्रता.....
| शांत नहीं है अभी लहरें |
| परमार्थ .....एक बार फिर बिना शिव मूर्ति के |
| गंगा माँ से शांत होने की प्रार्थना करते परमार्थ आश्रम के वासी |
| तबाही के निशान (ऋषिकेश में ७३ इमारते ढह गयी ) |
| मुनि रेती ...आवेग के आगे बस नहीं |
| त्रिवेणी घाट क्या से क्या हों गया |
| जलमगन होने के बाद इस कार का हाल |
| त्रिवेणी घाट |
| गंगा दशहरा का पूजन |
| गंगा माँ की आरती all pictueres by Anoop Khatri |
Tuesday, June 18, 2013
क्यों रुष्ट है माँ गंगा .....?
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| मुनि के रेती |
कल से हालत कुछ ठीक हुई है वर्ना कल जिस तरह से गंगा ने अपना रोद्र रूप दिखाया था उससे सभी गंगा के करीब रहने वाले सकते में थे ....
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| क्रोधित रूप में माँ गंगा |
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| परमार्थ में शाम को भजन व आरती पहले की तरह हों रही थी |
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| चेंद्रेस्वर नगर यहाँ गंगा का पानी लोगो के घरो में घुस जाता है यह बाद के चित्र |
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| मुनि की रेती में गंगा का रूप देखने आये लोग |
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| आरती के दृश्य,त्रिवेणी घाट |
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| गंगा की आरती .....आस्था कभी नहीं रूकती |
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| पहाड़ो पर घने मेघ है पता नहीं अभी और कितना कहर बरपेगा .. |
Monday, June 10, 2013
कही दुःख में न बदल जाये गंगा का सानिध्य......
गर्मियों की छुट्टियों व भयानक गर्मी के कारण देश के दिल्ली] उत्तरप्रदेश] पंजाब हरियाणा ]चंडीगढ़ व राजस्थान सहित अन्य राज्यों से हजारो की संख्या में पर्यटक इस तीर्थ नगरी का रुख कर रहें है शनिवार और रविवार को तो इनकी संख्या इतनी बढ़ जाती है की मुख्य मार्गो पर जाम की बुरी स्थिति हों जाती है ]
गंगा के तट यात्रियों से भर जाते है गंगा की लहरे तटो की सुन्दरताचारो और से हरे भरे पहाड़ यहाँ का मनोरम वातावरण आने वाले लोगो के चेहरे पर खुशिया ला देते है पर क्या उन सभी की खुशिया बरकरार रहती है- गंगा घाटी में एक के बाद एक हादसे हुए है उससे आने वाले यात्रियों के सुरक्षा खतरे में लगती है -
पर्यटकों के मन में सबसे अधिक उत्साह गंगा में राफ्टिंग करने के लिए रहता है लेकिन राफ्टिंग कंपनियों के गिरते स्तर के कारण अधिक मुनाफा कमाने के कारण इन पर्यटकों की जान पर बन आती है अनुभवी गाइड सुरक्षा मानको पर खरे न उतरने वाले उपकरणों के सहारे गंगा में रैपिड व राफ्ट उतार दी जाती है जिसके कारण गंगा के तेज लहरों में कब कौन सा हादसा हों जाये कोई नहीं जानता ]
पिछले दो वर्षो इन हादसों में बढोतरी हुई है
गंगा के घाटों पर नहाना भी कई बार खतरनाक साबित होंता है यहाँ से अनजान यात्री डेंजर घाटों पर भी नहाते है और गंगा के वेग में बह जाते है रोके जाने पर भी पर्यटक नहीं मानते और चोरी छिपे एसे खतरनाक घाटो पर नहाने तो जाते है पर फिर जिन्दा वापस पर भी नहीं आते .कुछ खतरनाक घाट बॉम्बे, ,गोवा बीच,लक्ष्मण घाट ,तपोवन घाट ,सच्चा घाट ,राधेश्याम घाट ,मस्तराम घाट ,दयानंद घाट ,पूर्णानंद घाट शत्रुघ्न घाट आदि है .
पर्यटन जो यहाँ की अर्थवयवस्था का आधार है यदि बाहर से आने वाले पर्यटक रोमांचक खेलो को व रैपिड पर लहरों से चुनौतियो पर जाने का मन रखते हों तो उनकी सुरक्षा की भी राज्य सरकार बनती है जिस तरह पर्यटन बढ़ा है उस तरह पर्यटकों की सुरक्षा की पुख्ता इंतजाम भी किये जाने की और भी अधिक जरुरत है .ताकि जो भी यहाँ आये सुखद यादे साथ लेकर जाये न की दुखद ,साथ ही पर्यटकों को भी चाहिए की सुरक्षा चेतावनियों को अनदेखा न करे जहा जाने की व स्नान पर पाबन्दी हों वहा इनकी अनदेखी न करे और खुश होकर यहाँ से वापस जाये .
Sunday, June 2, 2013
सपने में कहा हनुमान ने प्रतिमा स्थापित करने को ----हनुमान मंदिर--- ऋषिकेश (अंतिम भाग)
ऋषिकेश के मायाकुंड के हनुमान मंदिर स्थापना के पीछे जो दिव्य घटना मिलती है उसके अनुसार संत जीवन बिताने वाले उड़िया बाबा हमेशा के तरह प्रात: स्नान करने के पश्चात सूर्य को जल चढ़l रहे थे एस दोरान उनके हाथो में हनुमान जी के छोटी से मूर्ति स्वममेव आ गयी l इस घटना से अचंभित उड़िया बाबा अपने निवास स्थान पर वापस आ गए l पूरा दिन इस इस बारे में सोचते रहे रात को जब वह सो गए तो उन्हें सपना आया जिसमे राम भक्त हनुमान ने उनसे कहा कि उनकी इस छोटी सी प्रतिमा को विशालकाय रूप में स्थापित किया जाये l उड़िया बाबा परेशान थे की उनके पास धन नहीं है l फिर वह इस मूर्ति को बड़ी मूर्ति के रूप में केसे स्थापित करे ?
अगले दिन चारधाम की यात्रा के लिए चित्रकूट से एक महात्मा परमहंस लछमनदास यहाँ आये उन्होने अपने साथियों के साथ उड़िया बाबा के निवास पर पड़ाव डाला l उन्होंने कहा की चारधाम से पूर्व वह इस स्थान पर हनुमान जी की विशाल मूर्ति की स्थापना करवायगे l संतो ने अपने प्रयास से प्राकृतिक सामग्री पेड़ो से प्राप्त गोंद लाख एवं उड़द की दाळ आदि उपायों से हनुमान जी के प्रतिमा का निर्माण करवाया l जब हनुमान के यह मूर्ति पूरी बन गयी तो चित्रकूट से आये महात्मा वापस चले गये l शायद उन्हें उड़िया बबा की मदद के लिए भगवान ने ही भेजा था l
१९६३ में उड़िया बाब ने शरीर त्याग दिया तत्पश्चात मंदिर का संचlलन भरतदास महाराज ने किया l मंदिर तथा आश्रम चार धाम के यात्रा हेतु आये साधु सन्याशी एवं महात्माओ का विश्राम स्थल शुरु से रहा है l यहाँ उनकी समानभाव से सेवा के जाती है l इस सम्बन्ध में प्रचलित है कि उड़िया बाबा गांजा व नशा आदि करने के अनुमति प्रदान नहीं देते थे l
मंदिर में प्रतिस्थित हनुमान की मूर्ति लगभग नो फिट ऊँची है l इस प्रतिमा का निर्माण पाषाण से नहीं वरन मिट्टी आदि से हुआ है जिस पर सिंदूर पोत कर वर्तमान स्वरुप प्रदान किया है इस तरह के प्रतिमा अब नहीं बनायीं जाती यह संतो के पराक्रम का एक उदहारण है l
हनुमान मंदिर में राम लक्षमन एवम जानकी का मंदिर भी इसे परिसर मे है l मंदिर मनोकामना सिद्ध है इसी विस्वास के कारण यहाँ बहुत दूर दूर से श्र धालू आते है l
अगले दिन चारधाम की यात्रा के लिए चित्रकूट से एक महात्मा परमहंस लछमनदास यहाँ आये उन्होने अपने साथियों के साथ उड़िया बाबा के निवास पर पड़ाव डाला l उन्होंने कहा की चारधाम से पूर्व वह इस स्थान पर हनुमान जी की विशाल मूर्ति की स्थापना करवायगे l संतो ने अपने प्रयास से प्राकृतिक सामग्री पेड़ो से प्राप्त गोंद लाख एवं उड़द की दाळ आदि उपायों से हनुमान जी के प्रतिमा का निर्माण करवाया l जब हनुमान के यह मूर्ति पूरी बन गयी तो चित्रकूट से आये महात्मा वापस चले गये l शायद उन्हें उड़िया बबा की मदद के लिए भगवान ने ही भेजा था l
१९६३ में उड़िया बाब ने शरीर त्याग दिया तत्पश्चात मंदिर का संचlलन भरतदास महाराज ने किया l मंदिर तथा आश्रम चार धाम के यात्रा हेतु आये साधु सन्याशी एवं महात्माओ का विश्राम स्थल शुरु से रहा है l यहाँ उनकी समानभाव से सेवा के जाती है l इस सम्बन्ध में प्रचलित है कि उड़िया बाबा गांजा व नशा आदि करने के अनुमति प्रदान नहीं देते थे l
मंदिर में प्रतिस्थित हनुमान की मूर्ति लगभग नो फिट ऊँची है l इस प्रतिमा का निर्माण पाषाण से नहीं वरन मिट्टी आदि से हुआ है जिस पर सिंदूर पोत कर वर्तमान स्वरुप प्रदान किया है इस तरह के प्रतिमा अब नहीं बनायीं जाती यह संतो के पराक्रम का एक उदहारण है l
हनुमान मंदिर में राम लक्षमन एवम जानकी का मंदिर भी इसे परिसर मे है l मंदिर मनोकामना सिद्ध है इसी विस्वास के कारण यहाँ बहुत दूर दूर से श्र धालू आते है l
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