Sunday, December 2, 2012

श्रद्वालुओ की सिद्वियों का केन्द्र भैरव मंदिर .....ऋषिकेश (अन्तिम भाग)

शिव की अनेक अशांत मुर्तिया उस वर्ग की है ,जो उनसे संबद्व किसी पौराणिक कथा का चित्रण नही करती अथवा उसमें कथा तत्व अस्पष्ट होता है । इसी तथ्य को लेते हुए इस मंदिर में प्रतिष्ठत बटुक नाथ भैरव रूद्र शिव का महत्वपूर्ण रूप है जो मध्यकाल में यहां प्रचलित हो चुका था । डा0 शिवप्रसाद नैथानी  लिखा है कि "कालिकागम (20-25) में प्राचीन काल में पुरनिवेश में इस तरह की कई बातों का ध्यान रखा जाता था जैसे देवतायन बने वह नगाभिमुख हो शिवलिंग और भैरव की स्थापना हो तो वह बस्ती के बाहर हो शमशान घाट दक्षिण में हो आदि ।" यह मंदिर भी इसी क्रम में बस्ती के बाहर तथा शमशान घाट के नजदीक ही है । ऋषि केश के लिए कुब्जाम्रक शब्द ऎतिहासकि एवं पौराणिक है  और 2200 वर्ष पहले का माना गया है । कुब्जाम्रक पुरनिवेश होने के कारण यह मंदिर लगभग इतना ही पुराना है । यह बात जरूर ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान में बने इस मंदिर से पहले यहां भैरव की मूर्ति  एक झोपडें में थी बाद में इसका विस्तार किया गया । 
भैरवनाथ मंदिर में भैरव वास्तव में वैदिक रूद्र के व्याध कृत्य का पथप्रदर्शक है । डा0 यशवंत सिंह कठोच ने गढवाल में प्राप्त मुर्तियों को निश्चित रूप से तांत्रिक कहा है । प्रो0 बनर्जी ने "भैरव और योगनियों में घनिष्ठ संबन्ध बतलाते हुए कहा कि इसमें कुछ भी संदेह नही कि भैरवों व योगनियों को सम्रग संकल्पना स्वरूप में पूर्णत: तांत्रिक है "। यही नही बागची ने अपनी पुस्तक दि"कल्चरल हेरिटेज आफ इंडिया,खण्ड 4पृ0216 में तंत्रों के विकास पर विचार करते हुए लिखा है कि "अष्टमालों के प्रणेता भैरव मानव आचार्य प्रतीत होते है जो पूर्ण आध्यात्मिक मुक्ति पाकर प्राय: शिव रूप हो चुके थे ।" इतिहास वेत्ताओ ने इस संबन्ध में एक निष्कर्ष यह भी निकाला कि ऋषिकेश मंदिर के अधोतल में स्थित पतालेश्वर महादेव से थोडी दूर पर इस गण प्रमुख एवं अनति पर स्थित  वीरभद्र प्रधानगण स्थित होने के कारण  प्राचीन तट पर शैव तीर्थ पर परवर्तीकाल में क्रमश: वैष्णव संप्रदाय और पश्चात रामावत  तथा शक्ति संप्रदाय का भी युग विशेषों में प्रभाव रहा है ।
 नवंबर माह में भैरव अष्टमी के दिन मंदिर में भैरव की विषेश पूजा अर्चना की जाती है भैरव की ज्योति का प्रतीक एक अखण्ड दीपक मंदिर में हमेशा प्रज्जवलित रहता है।भगवान शिव के अशांत रूप की नही अपितु संहारक रूप की पूजा भी श्रद्वालुओ द्वारा समान रूप से की जाती है शनिवार के दिन यहां अधिक श्रद्वालु आते है इस स्थान की महत्ता बहुत अधिक है क्योकि लोगों को सिद्वियों की पूर्ति में भैरवनाथ का विशेष  महत्व है  इसीलिए उनके इस प्राचीन व दुर्लभ रूप के दर्शनों के लिए श्रद्वालु दूर- दूर से आते  है।

Wednesday, November 28, 2012

श्रद्वालुओं की सिद्वियों का केन्द्र...........भैरव मंदिर ऋषिकेश

ऋषिकेश के लक्ष्मणक्षूला मार्ग में चन्द्रभागा नदी के पुल को पार करते ही ,भैरवनाथ का प्राचीन मंदिर स्थित हे । इस मंदिर में भैरव की विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठत है । 
गढवाल में भारत के अन्य भागों की तरह शिव प्रतिमा के दो रूप प्राप्त होते है ,लिंग प्रतिमा व रूप प्रतिमा । रूप प्रतिमा में शिव को विभिन्न मूर्तियां परिलक्षित हई । जिसमें शिव की वीणाधर दक्षिणामूर्तियां,कल्याण सुंदर मूर्ति,शिवनृत मुर्ति, उमामहेशवर मुर्ति, हरिहर मूर्ति एवं भैरवमूर्ति  सम्मिलित है। इस क्रम में शिव की शान्त मूर्तियों में दक्षिणामुर्तियां शिव के ज्ञान विज्ञान और कलाओ के उपदेशक के रूप कल्याण सुंदर मुर्ति प्रसिद्व  रूप नटराज की है । उमामहेश्वर व हर गौरी रूप गढवाल हिमालय में सर्वाधिक प्रचलित रूप  रहा है। उमामहेश्वर  की मूर्तियां एकता के तांत्रिक
सिद्वांत पर बल देती हैं । हरिहर की मुर्तिशिव परिवार में वर्णित है , यह शिव की सौम्य लीला मर्ति मानी जाती है ।उपरोक्त सभी मूर्तिरूव शिव के सौम्य रूप को दर्शाती है ।भगवान यिव का सौम्य व शांत रूप ही नही वरन उनके उग्र व अशांत रूप की प्रतिमायें भी मिलती है । हिन्दू त्रिमूर्ति में उनका संहार रूप भी प्रकल्पित हुआ है । इस केदार भूमि में शिव के अनेकों रूपा के की पूजा की जाती रही है भैरव रूप की महत्ता का वर्णन स्कन्द पुराण में मिलता है । जिसके अनुसार "तत्रैप गुणपों नाम भैरवों भीषणा कृति
यस्य दर्शन मांत्रेण नरो यति परागतिमा "।।(स्कन्द पुराण 9121अध्याय) 
इसका तात्पर्य है कि गणप नामक भैरवनाथ के दर्शन  को प्राप्त कर मनुष्य परम गति को प्राप्त होता हैं। 
जारी है ...........आगे जानने के लिए देखते रहे , ब्लाग गंगा के करीब

Saturday, August 11, 2012

कहां है वह स्थान जिनके बारे में पुराणों में उल्लेख मिलता है ।

कहां है वह स्थान जिनके बारे में पुराणों में उल्लेख मिलता है कही इन्सानी बस्ती व उसकी बढती जरूरतों के कारण क्रंकरीट के विशालकाय जंगलों में प्रकृति कही गुम तो नही हो रही ।आधुनिक और के विकास के नाम पर सभ्यता व संस्कृति जैसे शब्द मायने खोते जा रहे है ।जो सुन्दरता प्रकृति में  है वह सुन्दर अटिट्लकाओ में कहां । यहां यह कहने का मतलब बिलकुल भी नही की हम आदिवासी बन जाये ,कन्दराओ में निवास करे ।
कोशिश है तो बस इतनी ही की जो हमारी संस्कृति का हिस्सा है ध्यान रहे,वह नष्ट न होने पाये । गंगा के करीब ब्लाग पर प्राचीन पौराणिक मंदिरो स्थलों के बारे में जानकारी देने का मकसद सिर्फ इतना ही है की कभी हम इन स्थानों पर आये तो  यहां की पौराणिकता  तथा ऎतिहासकिता का हमें भान रहें..............।
गंगा के करीब पर आगे की पोस्टों में पढे अन्य धार्मिक एवं पौराणिक  जगहो व मंदिरों के बारे में । keep visiting 
Ganga Ke Kareeb htttp://sunitakhatri.blogspot.com

Monday, July 23, 2012

चन्द्रेश्वर महादेव मंदिर, ऋषिकेश



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·                      · मंदिरों की नगरी ऋषि केश में हिन्दुओ के प्रमुख ईष्ट महादेव शिव के तीन   सिद्वस्थल है जिसमें से दो सि़द्वपीठों में सोमेश्वर व वीरभद्रेश्वर के बारे में आप इसी ब्लाग पर पढ सकते है ।लक्ष्मण झूला मार्ग पर चन्द्रभागा पुल को पार कर चन्द्रेशवर नगर में गंगा नदी के करीब यह मंदिर स्थित है ।यह स्थान बेहद रमणीक जहां शिव भक्तों की आवाजाही ,पूजा अर्चना हमेशा चलती रहती है।   
                 पौराणिक  आख्यानों के अनुसार समुद्र मंथन के बाद आदिकाल में चन्द्रमा ने इसी स्थान पर हजारों वर्षो तक भगवान शिव की कठिन तपस्या की । चन्द्रमा की अराधना से प्रसन्न हो                   
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शिव ने चन्द्रमा को साक्षात् दर्शन देकर वर मांगने को कहा चन्द्रमा हाथ जोडकर प्रार्थना करते  हुए भगवान शिव से विनती की" हे वृषभध्वज ,मुझे अपने सानिध्य में रखकर सेवा करने का अवसर प्रदान करें ।"शिव चन्द्रमा को वरदान देते हुए कहा" हे, देव मै तुम्हारी अराधना से प्रसन्न हो तुम्हे अपने मस्तक पर स्थान देता हूं । "जिस स्थान पर बैठकर चन्द्रमा ने शिव की घोर तपस्या की उसी स्थान पर शिव स्वयं लिंग रूप में प्रकट हुए उन्होने चन्द्रमा को वर देते हुए यह भी कहा कि भविष्य में यह स्थान संसार में चन्द्रेश्वर के नाम से प्रसिद्व होगा । 

स्कन्द पुराण के केदारखण्ड में गंगा जी की तीर्थ श्रृंखला क्रम में श्री चन्द्रेश्वर महादेव के सामने कुमुद तीर्थ गंगा का वर्णन है यह स्थान कुमुद तीर्थ का स्थान ही है मंदिर के सामने समीप ही गंगा अपनी पावनता के साथ बह रही है । 
मंदिर के प्रागंण में खडे होकर पुर्व दिशा में देखने पर चन्द्रकूट पर्वत की आकृति द्वितीया के चन्द्रमा की    तरह दिखलायी देती है ।
मान्यताओ के अनुसार चन्द्रेश्वर महादेव लिंग पर 40 दिनों तक दूध से अभिषेक करने पर पुत्र-धन-धान्य की प्राप्ति होती है ।श्रावण मास में रूद्राभिषेक व जलाभिषेक का विशेष महत्व है ।





चन्द्रेश्वर महादेव मंदिर में स्वामी विवेकानन्द ने सन् 1860 में लगभग दस मास तक तपस्या की थी । मंदिर का वातावरण बहुत शान्त तथा निर्मल है





Saturday, July 7, 2012

चले कांवरिये शिव के धाम-------


श्रावण मास की शुरूवात के साथ कावंड यात्रा का भी प्रारम्भ हो चुका है तीर्थ नगरी में कावंडियों के आगमन के साथ ही प्रशासन भी चौकन्ना हो चुका है । पहले ही दिन हजारों की संख्या में शिव भक्तों  ने नीलकंठ महादेव में जलाभिषेक किया। कावंड मेले की शुरूवात व कांवडियों के आगमन से
स्थानीय व यात्रा मार्ग में पडने वाले दुकानदारों के चेहरों पर रौनक आ गयी है जगह -जगह कावंडियों के लिए दुकाने भी सज चुकी है ।








कौन है यह कांवडियें ? इतनी बडी तदाद में क्या करने आते है गंगा के करीब । बच्चों के में यह सवाल उठते है । कावंड यात्रा का सम्बन्ध काफी पहले से चली आ रही गंगाजल को लेकर चली आ रही परम्परा से है । इतिहास विदों  के अनुसार सम्राट अशोक के लिए गंगास्रोत से मुहरबंद गंगाजल पहुंचाया जाता था । गंगाजल

में मौजुद जीवाणु रक्षक बैक्टिरियों फेज के कारण इसका महत्व इतना था की आचमन के लिए पुराने समय से ही राजा महाराजा इसे मंगवाया करते थे अशोक के बाद गंगाजल को ले जाने की परम्परा का पालन भारशिव नाग,गुप्तराजा,अकबर तथा औरंगजेब तक गंगाजल का इस्तेमाल आचमन के लिए करते थे ।आचमन के लिए गंगाजल की सारे भारत में मांग होने से इसे विभिन्न भागों में पहुचाने के लिए एक वर्ग का उदय हुआ जिसे "कांवरिए" कहा गया जो कांवर ढोकर गंगा जल पहुंचाते थे । कर्नल स्लीमैन ने इस बारे में लिखा है कि "हिन्दुस्तान के विभिन्न भागों में शिव एवं विष्णु मन्दिरों में हरद्वार से लाये गये गंगा जल को चढाकर , उसका चरणामृत लेकर भविष्य में रोगी को पथ्य रूप में पिलाने हेतु रखा जाता है । 

इस जल को छोटी कुप्पियों में ले जाया जाता है जिस पर प्रधान पुजारियों पंडों की मुहर लगी होती है । गंगा जल ले जाने वाले तीन प्रकार के होते है -तीर्थयात्री ,सेवक या मजदूर बेचने वाले।"
इतिहासकारों का यह भी मानना है कि  पहले हरद्वार से उपर ,गंगास्रोत से रमोली सेम मुखेम के फि क्याल गंगापुत्र ही लाते थे और इसी एकाधिकार के चलते द्वारहाट की कत्यूरी आल का ,गंगू रमोला गढपति से वर्षो तक युद्व चला था क्योंकि उसने आय मे हिस्सा देने से मना कर दिया था ।
यह तो थी इतिहास की बातें पर वर्तमान में कांवडियों का उदे्श्य तो वही पुराना है  मनौतियां मांगना, गंगाजल ले जाना व शिवलिंग का गंगाजल से अभिषेक करना पर खुद को शिवभक्त कह बम- बम का उदघोष कर कावंड लाना तथा गंगाजल ले जाना  इन सभी पहलुओ पर यह खरे नही उतरते यहां आ कर कुछ कांवडिये बताने वाले लोग अपनी उदडंता का तांडव मचाना अपना जन्मसिद्व अधिकार समझते है जिससे यहां के लोगो का काफी तकलीफों का सामना भी करना पडता है वह अपने घरों से भी निकलना नही चाहतें जब तक यह कांवड यात्रा चलती है। परम्पराओ व धार्मिकता को निभाने के लिए अन्य स्थानों से आये शिवभक्तों व कांवडियों को शान्ति पूर्वक अपनी यात्रा पूरी करनी चाहिए तभी वह सच्चे शिवभक्त बन पायेगे ।        

Tuesday, May 29, 2012

तीर्थ नगरी की विवशता................!

जैसे -जैसे गर्मी से पारा बढता जा रहा है वैसे वैसे तीर्थ नगरी की मुशकिलें भी  बढती जा रही है । भीषण गरमी के कारण बीमारियां तो अपने पाव पैसार ही रही है उस पर चार धाम यात्रा के लिए यात्रियों की संख्या  में कमी होने बजाय बढोतरी ही हूई है। इतनी अधिक संख्या में यात्री होने की वजह से चारधाम यात्रा के लिए प्रतिदिन सौ से भी ज्यादा बसें चारधाम यात्रा के लिए भेजी जा रही है फिर भी यात्री कई दिनों तक बस अडडे् में इंतजार करने को विवश है बस न मिल पाने के कारण वह तीर्थ नगरी में ही रूकने को मजबूर है इतने समय यही पर रुके रहने के कारण चारधाम यात्रा तक वह पहुंच ही नही पा रहे है साथ यात्रा के लिए वह जो रुपये पैसे खाने पीने को जा कुछ भी साथ लाये  सब यही खर्च हो गया। चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार होने के कारण चार धाम यात्रा का संचालन यही से होता है । इसकी बाबत प्रशासन द्वारा यात्रियों की सुविधाओ के लिए खासे इन्तजाम भी किये जाते है पर यात्रियों की तदाद का देखते हुए यह सभी व्यवस्थायें प्रभावी नही रह जाती है। संयुक्त रोटेशन के तहत जिन बसों का संचालन किया जा रहा वह बहुत कम है ।यात्रा व्यवस्था के लिए बनायी गयी सयुक्त रोटेशन में इन कमियो के  लिए प्लानिंग की कमी माना जा रहा है। ट्रेवल एजेंट भी अपनी मनमानी से बाज नही आ रहे जिसका प्रभाव सीधा यात्रा पर पड रहा है। गुस्सायें यात्रियों ने जाम तक लगा दिया बसे न मिल पाने के कारण यात्री बेहद खफा है । 
देश के विभिन्न स्थानो से आने वाले यात्रियों की अत्याधिक संख्या  के कारण इस तरह की समस्या तो आयेगी ही पर प्रशासन  की भी जिम्मेदारी दुगनी हो जाती है पर लगता है यहां अव्यवस्था से दो चार होना इस धार्मिक नगरी की आदत ही बन चुकी है कारण जगह जगह बढता अतिक्रमण,सडको पर यात्रियों के साथ घुमते आवारा पशु ,टैम्पुओ का चीखता शोर अब तो यहां की खास पहचान बन चुके है  क्या करे भगवान भरोसे ही तो  है सब व्यवस्थाए इससे क्या फर्क पडता है जिस तीर्थ नगरी की यात्रा के लिए दुसरी जगहो से लोग घुमने व तीर्थ करने गंगा नहाने आते है उन्हे बदले क्या वह सब कुछ मिल पाता है? 

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यहां वीरभद्र प्रकट हुआ था ----- वीरभद्रेश्वर मंदिर (ऋषिकेश)

पिछली पोस्ट में मैने ऋषिकेश के वीरभ्रद्र क्षेत्र का इतिहास बताया था पर इस पोस्ट में यह बता दू कि क्यो इस क्षेत्र को वीरभद्र के नाम से जाना ...